आरज़ू


“आरज़ू”

“तेरी आरज़ू में उम्र तमाम, कुछ यूँ भी गुज़र गयी

कब ग़मों के मौसम आए खबर ना हुई

हाँ भीगी थी कभी पलकें, तुझको याद करके  भी

थोड़े से गुल मेरे बाग के मुरझाए भी थे

मगर मेरे ऐतबार में कभी कमी ना हुई”

इक अंदाज़ ही था उनका जिसपे हम फ़ना होते रहे

सारी कायनात इक तरफ़

और मेरी बाहों की जन्नत इक तरफ़

माना कि उम्र भर को ना सही, 

दो घड़ी को तो ख़ालिस मुहब्बत नसीब हुई”



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