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Friday, October 16, 2009

"बिन पिए"

"उनकी मोहब्बत हमको रास ना आई कभी
वो सुर्खी उनके लबों की , लबों पे हमारे ना छाई कभी
आज भी हम अंधेरों में , नशा किया करते हैं
नींद बगैर तेरे , बिन पिए ना आई कभी
इक बार छलक जा इस कदर ऐ शराब
इस अँधेरी रात में , निकल जाए कहीं से अफताब
के वो खनकती हँसी उनके रुखसारों पे फ़िर ना आई कभी "
"मैखामोश नही के इकराज़ दफ़न है
दिल मेरा भी धड़कता है
बस अरमानो की लाश पे कफ़न है
सुनने वाले सुन ले कभी तू भी आरजू हमारी
हर पन्ने पे अपनी तकदीर के बस इबारत-ऐ-सितम है
लगता है कीअब तो नज़ारे बहारों के आयेंगे ज़रूर
सब्जबाग लाह्लाहयेंगे जरूर
महंगी हो रही अब तो हर रात अपनी
क्या कहें सफर की अपने
शुरू से आखिर तक बस उजाड़ चमन हैं
मै खामोश नही ..........
दिल मेरा भी ............
छीन ले तू भी हर लखतेजिगर हमसे
ऐ खुदा तेरी झोली में भी हमेशा
अपनी खातिर इक दुआ कम है
मै इतना बड़ा तो नही की तुझसे लड़ जाऊं
भूलकर तुझे , अपने इबादतगाह बनाऊं
शायद ना मालूम तुझको भी
उठा कर हाथ तेरे सजदे में
बंद कर के निगाहें अपनी
ये जिन्दगी चाहती, बस तेरी इक नगहें-करम है "

"शिकायत"


"ना जफा करते हैं वो , ना वफ़ा करते हैं वो
दे के सुकून मेरे दिल को रोज दगा करते है वो
कहते ना कभी कुछ भी उनसे , सुनते ही हैं बस जिनसे
दिखलाते हैं , हर वक्त फसाना-ऐ-मोहब्बत हर रोज
और मुझ ही से शिकायत करते हैं वो "

Thursday, October 15, 2009

"ग़लत कदम "

"कुछ मज़ा ही रहा, कुछ खता ही रही

जाने वो क्या ग़लत कदम था ,

की जिन्दगी अपनी सारी, बस इक सज़ा ही रही "

"रंज"

"रंज क्या करें अब तो गम का

अँधेरी राहों का , ज़माने के सितम का

भूल चले अब तो सब चाहने वाले

बस अब तो याद ही किया करते हैं, वो दिन चिरागों वाले "

"हाल"

"हाल पूछ के , और ना तबियत नासाज़ किया करो हमारी

दर्द तुम्हे भी होगा हमारी साफबयानी से

तुम्हे लगता होगा की बड़े नादान हैं हम

ये जख्म भी मिला है हमें , तुम्हारी ही मेहरबानी से "

"फरियाद "

"किसने इस जहाँ में हमको , कब सुकून दिया है

हर कदम पे दिल को अपने , ख़ुद ही दगा दिया है

आजमाने वालों, अजमा लो तुम भी शराफत हमारी

जाने कब से, हमने खुदा से भी फरियाद करना छोड़ रखा है "

Friday, October 9, 2009

"इकराज़ "

"ना कोशिश करो मुझको जानने की , ना दुआ करो मेरे मरने की
मै नूर हूँ अफताब का , निगाहों में चमक बन के छा जाऊंगा
कभी मै इक कतरा सुर्ख खूनी , इक नाजनीन के रुखसारों में नजर आऊंगा
ना मिला करो रोज़ ही मुझसे , ना कोशिश करो , मुझको समझ पाने की
मिल के भी ना मिलता मै कभी किसी से, उलझा हुआ इंसान , ना सुलझ पाउँगा
मै इक परिंदा मस्त हवा का , तेरी जुल्फों को उड़ा जाऊंगा
तू लाख कर ले कोशिश , मुझको ,मिटाने की, भूल जाने की
बस इक राज़ हूँ मै , उमर भर को तेरे ख्यालों में रह जाऊंगा "

"तमन्ना"


"इक बार तेरी गली से गुज़र जाए ये जिन्दगी

ऐ खुशी , खुदा से यही दुआ करते हें

ना रूठकर कभी तू आई , वापस फ़िर ,

जाने क्यों मगर , बेकार ही तेरी तमन्ना करते हैं

औरों में ख़ास क्या है , ना जान पाए हम कभी

उनकी तरह मगर तुझको , बाँधने की जिरह करते हैं

बहुत शोर है , चारों तरफ़ गम का हर वक्त पास हमारे

वो रुनझुन तेरी हँसी की बस अब तो याद किया करते हैं

इक सब्ज बाग़ बनाया था , बड़े दिल से वफ़ा का , तेरी खातिर

जाने क्यों मगर , हुस्न वाले, कागजों के रेगिस्तान पसंद करते हैं

इक बार तेरी गली से गुजर जाए ये जिन्दगी

ऐ खुशी , खुदा से यही दुआ करते हैं "

Friday, October 2, 2009

"शुभदिन" (short story)

पिछले कुछ दिनों से मै अपनी समस्याओं से बहुत ही परेशान था, तन्हाई , पैसों की तंगी , बहुत सारीजिम्मेदारियां और बहुत सारी ऐसी ही कई बातें जो अब बहुत मामूली लगती है, और साँस की तरह जिन्दगी से जुड़ी हुई हैं। ऊपर से दिवाली का त्यौहार भी आ रहा था, जब भी अपने आपकी तुलना दुनिया से करता तो सोचता की मै कहा हूँ ? किस जगह पे हूँ । क्या कोई नई जिम्मेदारी लेनी चाहिए ? ऐसा कब तक चलेगा वगैरह वगैरह। जिन्दगी और एक आम आदमी की जिन्दगी में बहुत फर्क होता है। जिन्दगी मतलब खुशी , कामयाबी , रुतबा ऐसा आमतौर पे सोचा जाता है। मगर आम आदमी की जिन्दगी मतलब मुसीबतों का ढेर , पैसों की कमी , बहुत सारा काम , बहुत सारे अधूरे सपने, समाज और वक्त के साथ बढ़ने वाली कई जिम्मेदारियां। ऐसे में जिन्दगी के मायने बदल जाते हैं।
सारे रंग , आब , खुशियाँ कही खो जाती है। बीते कल का सफर गुज़र जाता है , आने वाला कल दिखाई नही देता और आज बहुत उदास होता है।
मै भी कुछ ऐसा ही महसूस कर रहा था। ऑफिस और अपने अकेलेपन के बीच मै ख़ुद को भूल गया था। भूल गया था की मै क्या हूँ ? मगर अचानक उस दिन मेरे एक साथी का फ़ोन आया , जिनसे अक्सर व्यावसायिक मुद्दों पर ही बातें हुआ करती थी। उस दिन भी मुद्दा निजी ना होकर व्यवसायिक ही था । मगर फ़ोन रखने से पहले उन्होंने मुझसे कहा "जिन्दगी में बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनसे बातें करने और मिलने पर अच्छा लगता है , और लगता है की ऐसे लोग दोस्त बन कर जिन्दगी में हमेशा रहे। आपका दिन बहुत ही शुभ हो , और खुशियों से भरा हो। "
उनके इन दो तीन वाक्यों ने मेरे सोचने का नजरिया ही बदल दिया , मुझे लगा की मुझमे बहुत कुछ ऐसा है जिसकी तुलना नही करनी चाहिए, अक्सर हम दिखाई देने वाली चीजों के सामने ना दिखाई देने वाले अपने गुणों को भूल जाते हैं। और अपनी रफ़्तार कम कर लेते हैं, जिन्दगी है तो मुश्किलें हमेशा रहेंगी , मगर हमें ये याद रखना चाहिए की , ऊपर वाला किसी ना किसी बहाने से आकर हमें जगाता रहता है , और कहता है , चलते चलो , जिन्दगी एक दिन बहारों की वादियों में , खुशियों के खजाने लुटायेगी , और शयेद तब जिन्दगी से , ना खुदा से , ना दुनिया से हमें कोई शिकायत ना हो।
"सितम से तेरे , फर्क नही पड़ता मुझको ऐ दुनिया
आज भी बहुत हैं ज़माने में , मेरे चाहने वाले "

Tuesday, September 8, 2009

"ख्वाब और हकीकत (virtual vs real)"


हकीकत और ख़्वाबों का बहुत पुराना रिश्ता है , और दोनों के बीच का अन्तर भी। बचपन में ख्वाब देखा करता था की मै धनवान , बलवान , ज्ञानवान , सुंदर, सजीला और सुखी इंसान बनूँगा। बस मुझे इंतज़ार अपने बड़े होने का था। मगर हकीकत मै ना मै धनवान बन पाया , ना ज्ञानवान और ना ही सुखी । ज्ञान मिला भी तो बहुत कुछ ऐसा जिसका जिन्दगी में बहुत कम इस्तेमाल हो। रही सुंदर और सजीले होने की तो वो भी कुछ ऐसी नही की धन और सुख मिले। ख्वाब में परियां हम पर गुलाब जल की तरह जान छिड़कती थी मगर हकीकत में कोई साइड डांसर या जूनियर आर्टिस्ट भी नही मिली। मुझे शौक था बेशकीमती कारों का और खूबसूरत गाड़ियों का , मेरे कमरे की दीवार ऐसी गाड़ियों की तस्वीरों से भरी हुई थी , मगर पिछले कई सालो से मै , अपनी दो पहिया ही चला रहा हूँ । कभी कभी टैक्सी में सफर कर लेता हूँ। जिन्दगी ने मेरे सपने पूरे ज़रूर किए मगर उस शिध्धतसे नही जैसे मै चाहता था। इसलिए ख्वाब और हकीकत का फासला अभी भी कायम है।

मैंने बचपन में सपना देखा था फाइटरपायलट बनने का , और जब मै अपने प्लेन से उतरूंसाइड में हेलमेटरख कर तो सफ़ेद कपड़ो में सफ़ेद लिली के फूलों का बुके लिए , होठों पे मोहब्बत भरी मुस्कराहट लिए , एक बेहद खूबसूरत लड़की अपनी बाहें फैलाये मेरा इंतज़ार कर रही हो । लेकिन इस ख्वाब की हकीकत ये बन गई की मै फायटर पायलट तो नही बन पाया , लोको पायलट बन गया , और जब धूल भरे रेगिस्तान से अपने काले पीले इंजन से डीजल के धुएँ पे खप कर जब मै उतरता , तो एक यमराज जैसी शकल वाला खलासी हाथ में हथोडी और पाना लिए कहता , "सब ठीक है या फ़िर कोई गड़बड़ छोड़ कर आए हो ? " वाह खुदा गजब की तेरी खुदाई , मांगी थी जन्नत , दोजख है पायी ।


लोगों को मेरे ख्वाब सुन कर लगता की , ये आदमी ज़रूर कुछ करेगा , मगर ये तो कोई भी नही जनता की कितना करेगा ?

कुछ लोग हमेशा कहते है की "somthing is better than nothing " मुझे ये बातें और ये कहावत समझोता पसंद लोगों की लगती हैं। और अगर जिन्दगी में कुछ करना है तो अपने सपनो में मिलावट करना बंद कर दो। हाँ तो पूरा हाँ और ना तो पूरा ना। माना की जिन्दगी एक खेल है , "its very better to try & fail than not trying it all " मगर जब तक खेल खेलना है तबतक कभी ये नही सोचना चाहिए की हार नाम की भी कोई चीज़ होती है। माना की सपने टूटते हैं , बहुत तकलीफ देते हैं और उन निठल्लों को मौका देते हैं जो ख़ुद तो कुछ नही karte मगर औरों की हार का पूरा मज़ा उठाते हैं। मै ऐसे लोगों का भी शुक्र गुजार रहा हूँ , क्योंकि ये , हमारे अन्दर की आग को जिन्दा रखते हैं। managment की भाषा में इसे एक प्रकार का अभिप्रेरण (motivation) कहा जाता है। अगले की बेईज्ज़ती करो , अगर वो अपनी इज्ज़त करता है तो अपना performance सुधार लेगा।

माना की मेरे सपनो में मिलावट हो गई , मगर पिच में उतरने वाला हर बल्लेबाज century तो नही बना पता ना ? मगर इस बात से इतना तो ज़रूर पता चलता है की वो पिच पे खेलने का दम रखता है । और असली बल्लेबाज तो वो है जो भले ही सेंचुरी ना बनाये मगर जब तक पिच पर रहे बोलर की नाक में दम रखे और जनता का पूरा मनोरंजन करे। इसे ही जिन्दगी कहते है। हम कौन सा field चुनते हैं अपने लिए ये उस उमर में तय होता है जब हम ज्यादा समझदार नही होते , हमारे ज्यादातर निर्णय हमारे घर के लोग , या माँ बाप लेते हैं। अगर हम अपनी राय भी बताते है, तो वो या तो अपरिपक्व (amature) होती है , या वो नज़रन्दाज़ कर दी जाती है। फ़िर हमारे देश में जहाँ गलाकाट competetion है , ऐसे में हम आधे अधूरे और टूटे सपनो का ढेर बन जाते हैं । इसलिए चाहे जो भी हो अपने खवाबों को कभी मरने मत दो , उन्हें जिन्दा रखो, एक दिन ज़रूर आयेगा जब ख्वाब से ज्यादा हकीकत खूबसूरत होगी। क्योंकि अन्तर तो दोनों में हमेशा रहेगा ना ?

"वो लाख करें इनकार "

"वो लाख करें इनकार , मगर यकीन नही आता

नफरतों पे उनकी, इक बार भी यकीं नही आता

घुल चकी है मेरी वफ़ा उनकी रगोंमें इस कदर

फरेब उबकी जुबान से, निगाहों में इक बार भी नही आता

भुला दो उमर भर को मेरी बातें

आसमा से कह दो वो ना लाये चाँदनी रातें

रोज़ कहते हैं वो की ये मुलाकात आखरी है

मिले बिना मगर उनको भी करार नही आता

वो लाख करें इनकार मगर यकीं नही आता

नफरतों पे उनकी .............

मै गुमहो चुका , उनमे ना जाने कबसे

मेरी दुनिया है , जुदा इस दुनिया से

कैसे कहूं उनसे की यूँ ही किसी पे ऐतबार नही आता

और खाली दिल की दीवारों पे वफ़ा का रंग बार-बार नही आता

वो लाख करें इनकार मगर यकीं नही आता

नफरतों पे उनकी , इक बार भी यकीं नही आता "

Sunday, September 6, 2009

"हूर पार्ट ३ "

उस शाम मैदेर तक रेस्टोरेंट में बैठा रहा , जान्हवी जब मुझे देखती तो मै , या तो अपन सेल निकाल कर , कुछ बात करने का बहाना बनता या , ऍप्लिकेशन फोरम्स को उलट पलट करता। जब उसकी शिफ्ट ख़तम होने का टाइम आया तो मै भी उठा और बहर निकल कर मैंने उससे कहा। रात बहुत हो गई है अगर आपको बुरा ना लगे तो मै कुछ देर साथ चल सकता हूँ ?
जान्हवी: आपको ऐसा नही लगता की आप बहुत तेज चल रहे है ?
मै: (बुदबुदाते हुए ) वैसे ही लाइफ में बहुत लेट हो चुका हूँ , अब अगर तेज नही चला तो गाड़ी छूट जायेगी ।
जान्हवी: what !!!
मै : आआआअ॥ कुछ नही , मै कह रहा था की ....... आप यहीं की रहने वाली हैं ?
जान्हवी: हाँ , और आप ?
मै: भिलाई का , नाम सुना है ?\
जान्हवी: हाँ सुना है
मै: यहाँ जॉब केलिए आय था , पर अब यहाँ दिल लग गया .......
जान्हवी: दिल लग गया ........ मतलब ?
मै: मतलब दिल लग रहा है ......मतलब यहाँ अब अच्छा लगने लगा है .... वैसे पूरी तरह दिल नही लगा मगर कोशिश कर रहा हूँ , क्या पता दिल पूरी तरह लग जाए ।
जान्हवी: ओके , keep it up कोशिश का रास्ता कामयाबी की तरफ़ जाता है ।
वैसे आप झूठ बहुत बोलते हैं ।
मै: घबराकर मतलब ! मैंने आप से क्या झूठ बोला ?
जान्हवी: हा.हा.हा...... देखा आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं ।
मै: नही तो
जान्हवी: ह्हहा हाहा ..... ओके ओके ॥ एक बात बताओ , कौन सा ऐसा बैंक है जो मुझे बिल पेमेंट के लिए ९० दिन का टाइम देता है ? और अपने कस्टमर को हर शौपिंग पे 50% discount देता है ? और ऐसा कौन सा executive है जो सारा दिन अपने एक ही कस्टमर के पीछे , सुबह से शाम तक और हर weekoff पे उसी कस्टमर के पीछे लगा रहता है , और अपने साथ २ साल पुराने ऍप्लिकेशन फॉर्म रखता है ? बताओ?
(मेरे चहरे का रंग उड़ता जा रहा था और वो बोले जा रही थी , मुझे तो लगा था की १५ २० दिन तो फुर्सत से काटेंगे मगर , यहाँ तो सेंचुरी दूर १ ओवर खेलना ही मुश्किल हो गया था।)
मै: नही ऐसी तो कोई बात नही ........?
जान्हवी: अच्छा ऐसी कोई बात नही तो फ़िर क्या बात है ? तो फ़िर फ्रांसिस से मेरा सेल number क्यों लिया ?
(अब तो ये हाल था की पैरों तले जमीन खिसक रही थी , बस एक ही हथियार बचा था ..... अगले की सोच को पढने का । माना की वो सब समझ चुकी थी, मगर ये मेरी समझ में नही आ रहा था की , सब समझने के बाद भी वो मेरे saath इस अंधेरे रस्ते पे क्यों चल रही है )
मै : जब सब कुछ समझ ही गई हो तो लगता है मै हार मान ही लूँ इसी में भलाई है ।
जान्हवी: हम्म्म्म्म्म्म्म्म , तुम्हारी तैयारी पूरी नही थी । इसलिए तुम पकड़े गए ।
जान्हवी: मुस्कुराते हुए तुम्हे झूठ बोलना बिल्कुल नही आता।
मै:मै tumhe पसंद करने लगा था ,
जान्हवी: इतनी जल्दी ! तुम जानते क्या हो मेरे बारे में ?
मै: जानने समझने को तो जिन्दगी पड़ी है , मै तो इतना जनता हूँ , की एक नज़र में तुम मुझे अच्छी लगने लगी और दिल ने कहा की तुम अगर हमेशा को मेरी हो jaao तो बस लाइफ बन जाए ।
जान्ह्वी: मुस्कुराकर और अगर मै ना कह दूँ तो ?
मै: तो ये सोचूंगा की , इस बार भी मै फेल हो गया , और फ़िर कहीं कोई और exam दूंगा ।
जान्हवी: मुस्कुराकर बस बस अब कही कोई और एक्साम देने की जरुरत नही है , मै भी बहुत दिनों से तुम्हारी saari harakaten देख रही हूँ , ................
मै:हा हां हां ...... मतलब तुम नाराज़ नही हो ?
जान्हवी: अगर नाराज़ होती तो इस वक्त तुम्हारे साथ नही होती बुध्धू ।
मै : ओह्ह्ह्ह यार अब तो एक झप्पी की बनती है ,,, है ना ?
जान्हवी: ओये ॥ जरा धीरे चलो इतनी फास्ट चलोगे तो एक्सीडेंट हो जाएगा ॥
फ़िर उस रात हम देर तक बहुत सारी बातें करते रहे , अगले दिन का कार्यक्रम भी फिक्स था , अगले दिन uskaa week end था और मेरा भी। बस उसे छोड़ने के बाद मै घर आ गया। अक्सर लाइफ में जब ऐसे हसीं हादसे होते हैं तो लोग सबसे पहले अपने बकवास मगर भरोसेमंद दोस्तों के पास जाते हैं , क्योंकि पेट में hone wali गुदगुदी को मिटने का वो ही jariya होते हैं । मै भी अपने दोस्तों के पास गया .वो pahle तो बहुत खुश हुए , मगर फ़िर अपने अपने suggetions देने लगे ।

एक: "यार तेरी कहानी तो बहुत फास्ट चल रही है , इतनी जल्दी तेरी मोहब्बत हो गई , प्रोपोसे भी हो गया , और उधर से हाँ भी ! मुझे तो लग रहा है की तेरी शादी भी बहुत जल्दी हो जायेगी.......... "
दूसरा: "हाँ और divorce भी , और शयद tere सारे बच्चे premature babies ही होंगे ६ -६ महीने wale । जिसमे pahla तो जरूर । "
मै: "saalon तुम जैसे दोस्तों के होते हुए , dushmano की किसी को जरूरत pad saktee है ?


अगले दिन हम दोनों दिन bhar ghoomte रहे , और मैंने अपने दिल की हर khawaish उस दिन पूरी होते dekhi ।
जान्हवी: मुझे पहले दिन ही pata chal गया था की तुम बहुत badmaash किस्म के इंसान हो ,
मै: अच्छा !
जान्हवी: इसलिए तो तुम पकड़े गए । लेकिन ये बताओ हम इस garden में क्या कर रहे हैं ?
मै: यार पता है , पहले भी मै इन lovers gardens में आया करता था मगर मेरी halat mithayi की dukan के bahar khade उस भूखे बच्चे जैसी थी , जो bahar ही खड़ा खड़ा lalchata रहता है और लोगों को नज़र lagaataa रहता है ।
लेकिन उस दिन मैंने कसम khayi की जिस दिन मुझे मेरी पसंद की लड़की मिल गई , उस दिन मै wapas inhi gardens में aaunga और इन सारी जगहों को दिखा दूंगा की मेरे पास bhii mithayi है । आज मेरा karz utar रहा है , warna ये kambakht पेड़ पौधे और ये kursiyan तक मुझे chidhati लगती थी ।
janhwee : ohh तो ये बात है ? but अब तो सारा hisaab barabar हो गया ना ?
मै: are abh कहाँ अभी तो दिल्ली का indraprasth garden , mumbai की marine drive और jaipur की kanakghati भी baaki है ।
जान्हवी: अरे नही बाबा ! तुम तो मुझे bhrat darshn कर doge ! इतना टाइम नही है मेरे पास ।
मै: are तुम क्या jaano , जब मेरी aankho के सामने छोटे छोटे लड़के , आड़े , तेडे, काले पीले , लफंगे , प्यारी -प्यारी सी लड़कियों को लेकर ghoomte थे तो मेरे सीने पे सांप lot जाते थे , मुझे अपनी perosnality पे shak होने लगता था । मुझे इस सारी kaynaat को badlaa chukana है ।
जान्हवी: hahaahaahaa ....... हे भगवान् तुम कितने बड़े नाटकबाज हो ? मुझे तो मालूम ही नही था ।
(seriouse होकर )
me: तुम्हे ऐसा क्यों लगता है janhwi ? बस एक बार झूठ bola तुमसे , baaki सब सच bola , और वो भी पकड़ा गया , फ़िर भी तुम्हे ऐसा क्यों लगता है की I am saying lie ?
janhwi: offo मैंने ऐसा to नही कहा , tumhara mood भी ना पता नही कब badal ? ok बाबा sorry ।
(muskurakar ) अच्छा batao अब किस lovers point पे jaanaa है ?
(और bas इस तरह hamaari mohbbat shuru हो गई ...... दिन बहुत ही मीठे और raten khwaabon की baahon me beetne लगी ........)
To be continue........................................

Saturday, September 5, 2009

"दौर-ऐ-तन्हाई"

"ये इल्म ना हुआ

दौर-ऐ-तन्हाई , से गुजर कर भी

की जिंदगानी में कोई

हमसफ़र ना होगा कभी

हसरतें लिए , बेदर्द ज़माने में

firaa करते हैं

की हमनवां , कोई तो होगा

कभी ना कभी "

Wednesday, September 2, 2009

"हूर " पार्ट २

"मै हमेशा से अपनी पसंद के मामले में बड़ा ही सख्त इंसान रहा हूँ । चाहे चीज़ छोटी ही क्यों ना हो मगर मेरे हर चीज़ को अपना बनने के पीछे एक बड़ी कहानी होती है , या यूँ कह ले की मै कोई भे चीज़ यूँ ही अपनी जिन्दगी में शामिल नही करता। मेरी जिन्दगी में जो भी चीज़ आती है वो मेरी शख्सियत का हिस्सा बन जाती है। और मेरी ख्वाइश यही होती है की मेरे साथ मेरी हर चीज़ को देखने वाला यही कहे की हम एक दुसरे के लिए ही बने हैं। उस छोटे से रेस्टारेंट की उस बाला को देख कर भी यही लगता था की बस इसे खुदा ने मेरी खातिर बनाया हो। अगर मै अपनी नज़रों में एक हारी हुई सल्तनत का शहजादा था तो वो ही मेरी हूर थी । कुछ सालोँ se मै अपनी जीवन साथी तलाश रहा था , मगर बताने वाले ऐसे रिश्ते बताते मानो, लड़की नाम की चीज़ इस दुनिया से ख़तम होने वाली हो, और हम सही , या ग़लत अच्छी या बुरी बातें छोड़ कर बस किसी को भी अपनी जिंदगी में शामिल कर ले , फ़िर चाहे उससे रत्ती भर भी मिजाज़ ना मिलते हो। खैर इसे तो किस्मत का खेल समझा जाता है, हम इस बारे में कुछ भी नही कह सकते मगर, कुछ तो हो ऐसा की लगे हां यही है वो। उस हूर में मुझको १००% यही नजर आता था की बस यही वो ठंडे पानी का चश्मा है , इस दुनिया के रेगिस्तान में , जहाँ मुझे अपने दिल की प्यास हमेशा बुझानी है ।

आज मै फ़िर हमेशा की तरह अपने ऑफिस से आने के बाद , रोज़ की तरह उस रेस्टारेंट में गया, मगर आज वो नही आई थी। मैंने एक दूसरे वेटर से पूछा "यहाँ आज स्टाफ कुछ कम सा लग रहा है" ? उसने जवाब दिया "बस एक स्टाफ कम है सर ". । उसकी व्यंग भरी मुस्कराहट मेरी भी समझ में आ गई थी , आख़िर वो भी सब देखा करता था की मै सारी दुनिया छोड़ कर अपने आर्टिकलs लिखने के उस छोटे से भीड़ भरे रेस्टोरेंट में ही क्यों आता हूँ । उसने कहा आज जान्हवी नही आई है । मैंने पूछा उसका नाम जान्हवी है ? उसने कहा हाँ । मैंने फ़िर पूछा क्यों ? उसने कहा अरे साहब आप आपना berger खाओ क्यों ये सब बातें पूछते हो ? मैंने फ़िर कहा free में थोडी पूछ रहा हूँ ? और एक १०० की पत्ती का अचूक हथियार चला दिया। वो मुस्कुराते हुए कहने लगा ठीक नही है सर । उसका नाम जान्हवी है , वो राजोरी गार्डन में रहती है , आज उसके घर में कुछ काम है इसलिए नही आई। और बस इतना कह के वो चुप हो गया। मैंने पूछा और क्या जानते हो ? उसका सेल number दे सकते हो? मगर वो छुप रहा। मैंने १ और १०० की पत्ती निकाली , तब उसने कहा हर इन्फोर्मेशन का चार्ज अलग है। मैंने ५०० का नोट निकल के उसे दे दिया और कहा ये उसका नम्बर बताने के लिए । उसने जल्दी से उसका नम्बर एक पेपर मेनू पे लिख के दे दिया। मैंने कहा ठीक है उसके घर का पता बता सकते हो ? वो कहने लगा इतनी जल्दी घर तक साहब थोड़ा स्लो चलो । मैंने कहा तुम अपना काम करो और जितना पूछा है बस उसका जवाब दो। और एक १०० का नोट और निकल के दे दिया । उसने खुशी खुशी उसका पता भी उसी मेनू पे लिख दिया। फ़िर मैंने पूछा तुम्हारा नाम क्या है ? उसने कहा फ्रांसिस। मैउठा और मैंने कहा कल तो आयेगी , की वो भी नही ? उसने कहा हां सर कल आयेगी । मैंने कहा तुम अपना भी सेल नम्बर दे दो .उससे नम्बर ले के मै चल पड़ा , मगर दिल में हजारों ख्याल आ रहे थे। पता नही वो आज क्यों नही आई ? जाने क्या काम पड़ गया ? आज फ़िर बादल दिल की जमीन को प्यासा छोड़ कर चले गए।

चलते चलते दिल में एक ख़याल आया की क्यों राजोरी गार्डन में उसके घर जा कर देखूं की शयेद उसके दीदार की अधूरी तमन्ना पूरी हो जाए। मगर फ़िर इरादा बदल दिया मैंने । वैसे भी मै उस उमर में था जब ये सब हरकतें जायदातर बचकानी मानी जाती हैं , माशूका की खडकी पर घंटों khade रहना और उसका पीछा करना , रोज़ अपनी कमीज़ की जेब में लाल गुलाब लगा कर निकलना , उसकी नज़रों में जबरदस्ती आना, ये सब बातें मुझे हमेशा से जयादा पसंद नही, मेरा मोहब्बत करने का नदाज़ कुछ अलग है , मै तो बस एक थाली सजा कर सामने वाली को पेश कर देता हूँ अब ये उसकी मर्ज़ी की वो निवाला उठाये या नहीख़ुद अपने हाथों से खिलाना , इसमे मेरा atamsammaan बीच में आ जाता था। सो मैंने सोचा की पहले मै अपनी बाकी तैयारी पूरी कर लू , फ़िर मै उसके घर की तरफ़ रुख करूंगा। मैंने एक सोशल networking साईट पर अपने शहर की साड़ी जन्ह्वियों के प्रोफाइल चेक कर डाले। और सब को ऐड भी कर लिया। अब मुझे काम और करना था, मैंने उसके सेल पे एक कॉल किया। २-३ रिंग जाने के बाद उसने फ़ोन उठाया और एक साथ हजारों सितार बज उठे , कानो में रस घोलने वाली वो मधुर आवाज़ सुनाई पड़ी "यस " । दो पल को तो जुबान हलक में ही अटक कर रह गई थी। फ़िर मैंने कहा क्या मै मिस जान्हवी से बात कर रहा हूँ ? उसने कहा हाँ कहिये आप कौन बोल रहे हैं ? मैंने अपनी योजना के हिसाब से कहा मैडम मै एक क्रेडिट कार्ड कंपनी से बोल रहा हूँ , हमारे पास बहुत सारे ओफ्फेर्स हैं , उसने कहा नो....नो॥ मगर मैंने बीच में ही कहा मैडम हमारे पास बहुत ही achhaa ऑफर है औए ये bilkul फ्री है। और अपनी योजना के हिसाब से मै जबरदस्ती उससे बातें करने लगा और उसके फ़ोन काटने से पहले ,तकरीबन १० मिनट्स की mehnat के बाद ,उसे इस बात के लिए राज़ी कर लिया की कल मै उससे मिल सकता हूँ । मगर इस बात की गारंटी नही है की वो कार्ड बनवाने को राज़ी होगी या नही। उसके फ़ोन रखने के बाद मुझे अपनी कांवेंसिंग पॉवर पे आश्चर्य हो रहा था की , मैंने उसे माना कैसे लिया ? मै बहुत खुश था
, अब मुझे बस कल का इंतज़ार था। मै अब उन हालातों में था जब एक -एक पल एक -एक युग की तरह लगता है। नींदे गायब हो जाती है। और अगर खालिस मुम्बैया भाषा में कहें तो दिल के चैनल पे बस एक ही प्रोग्राम चलता है , जिसका नाम इस वक्त जान्हवी था।

वैसे mai बहुत hi तन्हाई पसंद इंसान रहा हूँ , मुझे सामाजिक होना या सोशल होना पसंद है मगर मेरी अपनी एक दुनिया है , जिसका जिक्र मै अक्सर करता हूँ और उस दुनिया में मै अपने आप से मिलता हूँ , अकेले ही वादियों में घूमना , अकेले ही बेवजह कहीं निकल जाना , भीड़ में भी तनहा रहना , मुझे अच्छा लगता है । अकसर दिल्ली की गर्मी में , अपने आपको भीड़ से बचाने के लिए मै घंटो मेट्रो ट्रेन में ही घूमा करता हूँ , एक छोर से दूसरे छोर tak और फ़िर वापस । मगर आज मुझे ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था की मेरे ख्यालों की दुनिया में भी अब मै अकेला नही रहूँगा। एक बहुत ही ख़ास जगह दिल की दुनिया की जिसमे आने की इजाज़त किसी को नही है , मेरे अलावा , उस जगह मै उस जान्नाशीन को लाने वाला हूँ जिसका नाम जान्हवी था शायद । कहिर इन्ही ख्यालों में मै डूबा और जाने कब सो गया। जब नींद खुली तब अलार्म बज रहा था , और सुबह के आठ बज रहे थे। ९ बजे का appointment था उसके साथ । मै फटाफट उठा और तैयार हो कर निकल पड़ा, आज आईने में अपना दीदार भी शायद उसकी नज़रों से हो रहा था। मैंने सोच रखा था की एकदम से उसे दिल की बात नही बताऊंगा , पहले उससे जानने की कोशिश करूँगा , फ़िर देखूंगा की वो सिर्फ़ सूरत शकल की ही हूर है , या दिल से और मिजाज़ से भी हूर है ।
मै टाइम से १० मिनट पहले ही पहुँच गया , वो जगह भी एक छोटे से रेस्टोरेंट के बाहर थी , हलाकि वो रेस्टोरेंट खुला था मगर मै बाहर ही उसका इंतज़ार करने लगा , ठीक ९ बजे वो आती दिखाई पड़ी , मै चुपचाप अन्दर चला गया। और उसे कॉल किया । उसे मैंने बता दिया की मै कहाँ बैठा हूँ । वो मेरी मेरी तरफ़ आने लगी । मैंने उसे अपना परिचय दिया और उसे बैठने को कहा । जब वो बैठ गई तब मैंने अपना gogles निकाला , मुझे देख कर वो कहने लगी आप ! आप को ..... आप तो हमारे रेस्टोरेंट में रोज़ आते हैं। मैंने मुस्कुराकर हाँ में जवाब दिया। उसने फ़िर कहा , बताइए मुझे क्या क्या document देने होंगे और आपके पास क्या क्या ऑफर हैं ? मैंने कहा ठीक है मगर अगर आप बुरा ना माने तो पहले एक एक कप काफ़ी हो जाए , फ़िर मै आराम से सारे ऑफर आपको बता दूंगा । उसने कहा नही मै थोडी जल्दी में हूँ और वैसे भी मेरे job पे जाने का टाइम हो गया है । मैंने कहा जब तक cofee आयेगी तब तक मै आपको ओफ्फेर्स भी samjha दूंगा , और वैसे भी आप roj कुछ ना कुछ khilati ही रहती है आज मै आपको कुछ ऑफर करता हूँ। वो हल्का sa muskurayi और राजी हो गई । ऑफ़ वो kayamat , और वो बिजली कुछ ऐसी गिरी के हम बस मरे नही बाकी सब हो गया । मैंने काफ़ी का order दे दिया । और उसे yun ही ऑफर samjhane लगा , उन banawati ओफ्फेर्स में इतना कुछ था ही नही की कोई बैंक या कंपनी किसी को दे सकती थी , मगर मै उसे अपना सब कुछ दे चुका था। वो थोडी pareshaan हो जाती और कभी हल्का sa muskura देती , sakhtee से कुछ माना करने की उसकी kosish मुझे लगी नही। फ़िर उसने पूछा और कब तक मेरा कार्ड आ जाएगा ? मैंने कहा १५ से २० दिन के अन्दर आपका कार्ड आ जाएगा । वो तैयार हो गई और कहा अभी तो सारे documents नही है आप कल ले लेना। मैंने कहा कोई बात नही , आप कल दे देना इसी जगह पर , वो थोडी pareshaan हो कर बोली , यहाँ और थोडी देर चुप हो गई , मै उसकी बात kaat कर bola , अगर कोई problem हो तो रेस्टोरेंट में आ कर ले lunga। उसने कहा ठीक है कल आप रेस्टोरेंट में ले लेना ।
अच्छा अब मै जाऊँ ? वो मुस्कुराकर बोली , और आपकी coffe के लिए thanks ।
मै फ़िर अपने shatir हरकत पर और उसकी masoomiyat भरी muskurahat पर खुश हो गया । उसने धीरे से bye कहा और chali गई । मै भी घर आया और office चला गया , raste bhar मै उसके बारे में सोचता रहा , अब अगले १५ २० दिन तक तो हम ajnabi की तरह नही मिलेंगे , और फ़िर धीरे से मै अपना raaz khol दूंगा । बहुत achhee चाल chali थी मैंने , और फ्री में ही बहुत बातें जान lee थी , warna फ्रांसिस तो इसके kum से kum १००० rs ले लेता।
shaam को जब मै रेस्टोरेंट गया , तब जान्हवी मुझे pahchaan गई , और एक smile के साथ , मुझसे पूछा , आप यही रहते हो या काम भी करते हो ? मैंने कहा yaha रह के भी मै काम ही करता हूँ। अब यहाँ बैठे - बैठे ही मै कई लोगों के कार्ड bana दूंगा ।
to be continue....................................

Tuesday, September 1, 2009

" हूर "

"मुझे नही मालूम वो क्या करती है ? क्यों करती है? उसकी क्या मजबूरी है? और वो कौन है ? मगर उसमे बहुत सी बातें ऐसी है जो उसे कुछ अलग कुछ जुदा करती है, बाकी दुनिया से । बचपन में किस्से कहानियों में पढ़ा करता था की , शहज़ादे जब शिकार पे निकला करते थे , या कहीं ज़ंग लड़ने जाया करते तो कहीं वीरानो में उन्हें उनकी हूर मिल जाया करती थी। में शहजादा तो नही , मगर ज़ंग रोज़ लड़ता हूँ , और वीरानो में अपनी हूर, या अप्सरा को जाने कितने बरसों से तलाश कर रहा हूँ । आज एक रेस्टोरेंट में वो मुझको मिल गई। गजब की मासूमियत, ऐसी की शायद चंगेज़ खान भी अपनी गर्दन खुशी से उसकी खातिर कटवा लेता। चेहरे की रंगत ऐसी मानो एक कप दूध में , एक चुटकी सिन्दूरी रंग मिला दिया हो। पतले-पतले होठ , बिल्कुल गुलाब की तरह, हलके से सुर्ख गालों पे पसीने की झिलमिलाती बूँदें , आँखें ऐसी की लगे ज्यादा करीब आए, तो बस खरोच लग ही जाए। नाक नक्श फुर्सत से तराशे, किसी से कोई चाहत नही , मानो एक हूर जन्नत से जमीन पर आ गिरी हो , गलती से। ना कोई बनाव , नाकोई ज्यादा श्रृंगार , बस सीधी निगाहों से दिल में उतरने वाली तस्वीर , मानो किसी कलकार की कल्पना , हकीकत बन कर सामने खड़ी हो गई हो। और कह रही हो "येस सर "।

उस भीड़ में अक्सर घंटो बैठ कर में उसे निहारा करता था , बहुत कुछ ऐसी कल्पनाये किया करता जो पता नही कभी हकीकत बनती भी या नही। मगर हर रोज़ मेट्रो ट्रेन पकड़ के जाना और फ़िर उस रेस्टोरेंट में बैठ कर घंटो उसे देखना मेरा काम बन गया था। तरह तरह की बातें सोचा करता था, पता नही ये कौन है ? शादी शुदा है या फ़िर नही ? पता नही मेरे बारे में क्या सोचती है? उसकी नज़रों में एक रेस्टारेंट का कस्टमर ही हूँ, या कभी उसने मुझे देखने की भी कोशिश की है ? बस अनगिनत सवालों में उलझा मै उसकी तरफ़ ही देखा करता था । और अपने कागजी आस्मां पे कलम के साथ उड़ान भरा करता था । सच कहू तो मुझे अच्छा नही लगता था की वो वहां काम करती थी , मगर उस वक्त मै उससे क्या कहता ? दिल तो चाहता था की ये चाँद बस मेरे हथेली में सिमट कर , मेरी तकदीर बन जाए । वो अक्सर थक जाया करती थी , उसकी थकान उसके माथे पे और गालों पे पसीने की बूंदों के रूप में छलकने लगता था। जब उस वक्त मै उसे देखता तो दिल करता की बस उसे बाहों में उठा लूँ । मगर उस भरी भीड़ वाली जगह पर , उसकी उस थकान को देखने वाला कोई नही था, मेरा बस चलता तो मै उस रेस्टोरेंट में शायद नौकरी भी कर लेता उसकी खातिर , मगर मेरी मजबूरियां और मेरी पुरानी नौकरी , और उसका समय मुझे इसकी इजाज़त नही देता था। मै अक्सर इस बात को बड़ा परेशान रहा हूँ की , मुझे कभी भी आज़ादी से उड़ान भरने मिला ही नही , कोई ना कोई मजबूरी मुझे मेरी तरह पूरी तरह से जीने नही देती। खैर शायद ऐसा सबके साथ होता है। कभी कभार मै सोचता की मै पागल ही हूँ जो इस बनी बनाई व्यावसायिक गुडिया की खातिर रोज़ पैसे पानी में डालने चले आता हूँ। मगर जो भी उस रेस्टोरेंट की पॉलिसी रही हो , वो शर्बते-दीदार सचमुच तारीफ-ऐ काबिल था और बेशकीमती भी।
to be continue.............

"क़त्ल "

"क़त्ल कर भी दो मुझको , तो भी ना तुम जी पाओगे

ख्यालों से मेरे बच कर, भला कहाँ जाओगे

ठिकाना तो बन गया आपका, पहली ही नज़र में,

दिल
में हमारे,


लाख बना लो घर , ज़माने में

इस दिल के सिवा मगर, कहाँ रह पाओगे "

" आशियाँ दिल का "

"हम यूँ ही बनायेंगें आशियाँ , दिल का, समंदर की रेत पर

किसे डर है वक्त की लहरों का

तुम भले ही करो , शिकवा उमर भर हमसे

ये दिल आशिक है बस, तेरी निगाहों का

तुम लाख कहो ज़माने से , के कोरी है तेरी दिल की किताब,

मगर हमने भी देखा है ,तेरी छत पे , कपड़े सुखाते ,अक्सर ,

आसमान सात रंगों का

तुम दुआ करो खुदा से रोज़ दोजख मिले हमको

हमें तो रहेगा इंतज़ार ,बस, तुम्हारी बाहों की जन्नत का

खुदा भी नाराज़ रहता है ,हमसे अब तो

दिया है जो तुझको दिल में ,जबसे दर्जा खुदा का

मेरे मिजाज़ की परवाह ना किया करो

यु भी अक्सर , नाराज़ ना रहा करो

ये भी है बस एक दिल ही

परिंदा नही ये किसी सब्जबाग का

तुम्हे लगता है की , शैतान की शकल में इंसान हैं हम

ऐब है बहुत , मगर इंसान हैं हम

लाख दिखाओ हमसे नाराज़गी

देखा हमने भी मगर, सैलाब-ऐ-मोहब्बत तेरी निगाहों का

हम यूँ ही बनायेंगे आशियाँ दिल का समंदर की रेत पर

किसे डर है वक्त की लहरों का "

Sunday, August 23, 2009

"इंतज़ार ३ "

५। "मुकम्मल "

"इस रिश्ते को हमारे दोस्ती से आगे बढ़ाने दो

रूह को हमारी , आस्मां से जन्नत में आने दो

उमर भर को आ जाओ हमारे आगोश में

ग़मों को अपने , हमारे सीने में छुपाने दो

मुस्कुराहटों को हमारी , अपने लबों पे सजाने दो

इस रिश्ते को हमारे , दोस्ती से आगे बढ़ाने दो

जलती है रूह , टूटता है दिल

सूनी होती है जब , तेरे बगैर महफ़िल

समन्दर की लहरों को आज चाँद से मिल जाने दो

दिल की ज़मीन को अश्कों से , भीग जाने दो

इस रिश्ते को हमारे दोस्ती से आगे बढ़ाने दो

रूह को हमारी आस्मां से , जन्नत में आने दो

मुझको मालूम है, यकीं नही तुझको , मुझ पर

किनारों पर ही तैरते रहे , उमर भर

आज दिल की गहराइयो में हमें समाने दो

वफ़ा की हमारी ताक़त को आजमाने दो

और इस रिश्ते को हमारे दोस्ती से आगे बढ़ाने दो

मुझको याद है , खुशी में तेरे रुखसारों का सुर्ख होना

कर के नम आखें , मेरे ग़मों में तेरा खोना

याद है ये भी की कैसे तुम निगाहें पढ़ जाया करते थे

रह -रह के बेवजह हक़ जताया करते थे

बस इस खुमारी में ही सारी उमर बीत जाने दो

हाथों की तरह आज दिल भी मिल जाने दो

मुझको मालूम है रुसवाई से , दिल तुम्हारा डरता है

सवालों के साए में ही ये ज़मना चलता है

फक्र होगा तुम्हे उमर भर , बस इक कदम बढ़ाने दो

दिल की अपनी हालत को ज़माने के सामने आने दो

दुआये तुम्हारी अब भी असर करती हैं

जिंदगी शिकस्त से फतह को बढती है

हर नामुमकिन को मुमकिन बन जाने दो

अपने चहरे के चाँद को ,हमारी हथेली में समाने दो

और इस रिश्ते को हमारे दोस्ती से आगे बढ़ाने दो

रूह को हमारी आस्मां से जन्नत में आ जाने दो "

कहते हैं की शयेर बड़े बदनाम होते हैं , क्योंकि वो बड़े बेबाक और ख्याली होते हैं । इसके बगैर मगर कोई भी कलाकार नही बन सकता। क्योंकि वो कला के पंख लगा कर उड़ने वाला पंछी होता है , उसे बंधा नही जा सकता , वरना वो उड़ना भूल जाता है।

"इंतज़ार २ "

२। "अनजानी सी उम्मीद "

"शोले हमारी राहों पे यूँ ही बरसते रहे

खुले पाँव हम भी हंस के चलते रहे

हर मुश्किल आसान सी लगने लगी थी

तेरी हँसी , मेरे जखम सीने लगी थी

अनजानी सी उम्मीद पे हम भी बढ़ते रहे

बना कर जाम तेरे , हर दर्द को पीते रहे

दो पल की जुदाई ने , मगर , उन्हें क्या बना डाला

हमराज़ थे जो कल , वो बेवफाई कर गए

कल तक देने वाले मरहम , अब जखम चढाते रहे

महकाने वाले मेरे चमन को , वीरान बनाते रहे

शोले मगर हमारी राहों पे यूँ ही बरसते रहे

खुले पाँव हम भी हंस के चलते रहे "

३। "जन्नत "
"मुझको ख़बर नही की जन्नत क्या चीज़ है

तेरे रुखसारों से अश्क पीने में मज़ा आता है

मुझे अमीरों की जिन्दगी में यकीन नही

बस उमर भर तुझे सीने से लगाने को दिल चाहता है

मेरे खुदा माफ़ करना मुझको

मेरे महबूब पे मुझको, तुझसे ज्यादा यकीन आता है "


"इंतज़ार"

१३-११-२००७


आज बरसों के बाद मुझे ख़ुद को आंकने का मौका मिला है। आज मुझे वो मिला जिसे मै कई सालों से तलाश रहा था। मगर आज भी दिल में उहा पोह मची है , की वो आज भी मेरा है या नही ? आज पहली बार मेरा इंतज़ार उमर से छोटा लगा , वरना मैंने तो इसे उमर से बड़ा ही मान लिया था। आज मै कुछ ऐसी लाइनेलिखने जा रहा हूँ , जो शायद मेरी जिन्दगी की अव्वल दर्जे की नज्मों और शेरो में गिनी जाए । या शायद ना भी हो मगर मेरे दिल की खालिस बातें सीधी कागज़ पे आएगी।


। "चाँद मेरे आगोश "
" ऐ चाँद आज तुझे आगोश में ले लूँ
ये दिल करता है
ख़्वाबों को रेशम से बुन लूँ
ये दिल करता है
मालूम है पल-पल सरकती है वक्त की रेत
हथेली में अपनी जिन्दगी समेट लूँ
ये दिल करता है
मुझसे पूछो इन्जार-ऐ-दीदार की वो घडियां
जखम, दर्द, हार और वो लम्बी खामोशियाँ
आज हर दर्द अश्कों में बहा दूँ
ये दिल करता है
जिन्दगी अपनी तेरी चाहतों से सजा लूँ
ये दिल करता है "

Saturday, August 15, 2009

"जुल्फें"


१।" जुल्फें तुम्हारी जो खुल कर बिखर गई हैं
दिल मेरा मानो खो गया कहीं है
हकीकत हो तुम, मुझे यकीन नही है
डरता हूँ कहीं ये ख्वाब तो नही है "
२।
"इक अरसे से प्यासी रही दिल की वादी मेरी
इक बार जुल्फें तो बिखरा दो
वो रिमझिम तेरी हँसी की
वो ठंडी बयार, तेरी निगाहों की
गर्म हो रही , धूपसी साँसे , रूह से हमारी मिला दो
बड़ा सर्द है मौसम आज, तमन्नाओं का
इक सुलगता हुआ शीरीं सा शोला
सुर्ख रुखसार का , लबों को हमारे दिला दो
यूँ तो सिले ही रहे लब अक्सर ज़माने के आगे
दिल में उफनता , मोहब्बत का गुबार हटा दो
ना रहे आज तकल्लुफ कोई ,
शुक्रिया और शर्मिन्दगी के अल्फाज़ मिटा दो
बहुत प्यासा हैं, दिल हमारा जाने कब से
रंगों आब का वो मोहब्बत भरा जाम पिला दो
इक अरसे से प्यासी रही दिल की वादी मेरी
इक बार जुल्फें तो बिखरा दो "

Thursday, August 13, 2009

" बे इन्तहां मोहब्बत "

"बे इन्तहां मोहब्बत का

वो भी क्या ज़माना था

जिन्दगी तेरी चाहत का बस इक फ़साना था

वक्त ने तन्हाई भर दी अब तो ज़िन्दगानी में

हर पल अब तो कटताहै मुश्किल में

किस्मत को तो चाहिए बस एक बहाना था

बेमेल वो मोहब्बत बेमानी थी

फ़िर भी तुम हमारी जिंदगानी थी

दुनिया कहे चाहे कुछ भी

दिल हो के जुदा तडपे जितना भी

तुम्हे तो हमसे एक दिन, दूर ही जाना था "

Tuesday, August 11, 2009

"पिटते पति" (हास्य कविता)


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"शाम की मित्र मंडली जमी थी
पान गुटकों और , चटपटी बातों से दुनिया थमी थी
की अचानक एक परम मित्र ने चर्चा छेडी
गुत्थी अपने दिल की कुछ इस कदर खोली
कहा भाई साहेब आजकल की स्त्रियाँ बदल गई हैं
तरक्की के मामले में वो मर्दों से भी आगे निकल गयीं हैं
पहले वो सर झुका के रहा करती थी
हाल हो जैसा भी मगर दुनिया के आगे मुस्कुराया करती थी
पति और घर उसकी दुनिया थे
और बिगडे हाल वो कुशलता से सवारा करती थी
मगर बुरा हो इन टी वी सिरिअलों का
इन्होने अजब की माया फैलाई है
आज की स्त्री किसी के बस में नही आई है
आज की स्त्री जाने क्या क्या करती है
पल में सीता तो पल में शूर्पनखा बन जाती है
पानी भी पिलाये तो शक होता है
षडयंत्र रचना ,शक करना तो इनका जनम सिद्ध अधिकार मालूम होता है
ये कौन सी रचना है प्रभु की
जाने और क्या मर्ज़ी बुद्धू बक्से की
पुरूष तो सदा ही व्यभीचारी था
प्रकृति के नियमों का आभारी था
परिवार की रक्षा करना और दुनियादारी उसका काम था
अच्छे नागरिक बनाना , स्त्री के नाम था
पुरूष घाव खाता और देता था
थका हारा जब घर लौटता, तो स्त्री मरहम लगाती थी
इसी नियम से परिवार नाम की संस्था चल पाती थी
मगर भइया अब तो सब उल्टा पुल्टा हो चुका है
स्त्री भी बरबाद होने और करने पे आमदा हो गई है
कौन संभाले इस दुनिया को, अब तो हिरोइन भी वैम्प हो गई है
ये तो क्रांतीकारी परिवर्तन है
समाज नाम की संस्था के जीवन मरण का प्रश्न है
ऊपर से आजकल के पुरूष भी पुरूष जैसे नही लगते हैं
कान में बाली और बाल लंबे करे फिरते हैं
छनिक सुख की खातिर, अपनी या परायी सब स्त्रियों की सेवा धरम मानते हैं
कभी- कभी तो पुरूष प्रेम भी पालते हैं
बर्बादी इस समाज और परिवार की तो हो गई है
जाने क्या होगा इस दुनिया का, इसकी तो उलटी गिनती शुरू हो गई है
बहुत देर से सुन रहे थे परम मित्र की बातें शर्मा जी
जब ना रहा गया तो बोले
लाला जी क्यों परेशान होते हो
लगता है आजकल औरतों के धारावाहिक बहुत देखते हो
बंद घर में तुम भी कौन सा महापुरुषों वाला काम करते हो
सेवा तो तुम भी बहुत गृहलक्ष्मी की किया करते हो
आज ये उलटी गंगा क्यों बहाई है
छोड़ो करनी गोल मोल बातें
सच बताओ , लगता है ,
आज फ़िर गृहलक्ष्मी से उनके उलूक ने मार खायी है "









"दरस"


१."उनकी निगाहों में आज हमने , इक फ़साना देखा है
बिखरी है अपनी जिन्दगी, मगर,
इक मुक्कम्मल जमाना देखा है
अपने ग़मों की शिकायत नही मुझको खुदा से
उनके अश्कों से हमने , मुस्कुराना सीखा है "


२। "इक दरस का उनके, ज़माने से इंतज़ार है
बदले हैं चेहरे वक्त ने, हजारों
उस हमनशीं से हमें प्यार है
छुपती है हकीकत ज़माने की,
उनके नर्म रुखसारों से
होती है दिल्लगी बेरहम , अक्सर हजारों से
जाने फ़िर भी दिल क्यों कहता है
के ये जूनून नही बेकार है
बस इक दरस का उनके, ज़माने से इंतज़ार है "

Tuesday, August 4, 2009

"इक बात "


"मिले तो चंद रोज़ पहले ही तुम हमसे

बरसों से दिल में छुपायी , इक बात कहनी थी मगर तुमसे


मै क्या हूँ, क्यों हूँ , ये तुमसे मुझे कहना है

बड़ा वीरान है दिल और रास्ता बड़ा सूना है


गुजारे कितने तनहा सफर हमने

तम्मंनाओं ने तोडे दम जाने कितने


और दर्द का सैलाब जब भी बढ़ता रहा

ये दिल बस, जिन्दगी से तुम्हारी ही आरजू करता रहा


छुपाये थे ये राज़ , दिल में जाने कबसे

मिले तो चंद रोज़ पहले ही तुम हमसे


बहुत समझा जिन्दगी को, मगर फ़िर भी ना समझे

सुकून की तलाश में हम, ज़माने भर में भटके


ना जाने क्या-क्या खोया है उमर भर

मेरे अश्क की इक बूँद से, बड़ा नही समंदर


मेरी तस्वीरों की हकीकत, बन गए तुम

मिल के तुम से गम सारे, हो जाते गुम


इस वीरान चमन में , बहार बन के आ जाओ

गर्म राहों पे मेरी , घटा बन के छा जाओ


कहनी थी बस , यही इक बात तुमसे

के ये खुशनसीबी है , की मिले हो तुम, आज हमसे


कहना है और, बस यही, के कभी ना जुदा होना फ़िर हमसे

मिले तो चंद रोज़ पहले ही तुम हमसे "

"दिल का सुकून "


१."मालूम ना हुआ की , कब तुम अपने बन गए
देखते ही देखते , असमान के रंग बदल गए

धुंध सी छा गई यादों पे , हमारी

और अनजान थे जो कल तक , वो आज दिल का सुकून बन गए "


२."दिल के चंद अहसास , अब कैद ही कर लें

तो क्या गम है

दूर से ही देखी है हमने

तेरी मुस्कुराहटों की बहारें "


३ "चाहते हैं हम तुम्हे इतना, की क्या बताएं

कमी है अल्फाजों की, वरना हम तो लिखते ही जाएँ "

४ "आहट

"दिल में तुम्हारी , आहट का , अजीब ये अहसास है

कुछ ना होकर भी लगता है

की सब कुछ मेरे पास है "

"आवारा ख्वाब "


"बड़े आवारा हैं ख्वाब मेरे , टिकते ही नही किसी शाख पर
ना थमते हैं , ना रुकते हैं, बस बरस जाते हैं किसी बहार पर
ना माँगा मेरे ख़्वाबों ने कुछ किसी से
बस दे डाला अपना सब कुछ खुशी से
लहलहाई हैं वादियाँ जाने कितनी
खिलाये हैं इन्होने , गुल जाने कितने
दे के लबों को मुस्कान , बढ जाते हैं अपनी राह पर
बड़े आवारा हैं ख्वाब मेरे टिकते ही नही किसी शाख पर "

Sunday, August 2, 2009

"बरबाद गुलिस्तान"


"बरबाद गुलिस्तान ,गर्दिश में सितारे
कौन है साथ , अब किसका नाम पुकारें
मुझको नही पता की मेरा अंजाम क्या है
बस वफ़ा की ख्वाहिश में ,
दर्द में भीगा एक पैगाम नया है
इक झूठ कहा था , कभी मैंने तुमसे
इक चमक तेरी निगाहों में ,
जैसे चाँद सी सूरत में , चमकते दो सितारे
मजबूर था मै भी क्या करता
एक कमसिन कोरी सी तस्वीर में ,
मनपसंद रंग और कैसे भरता
तुम एक शहजादी नाज़ुक सी
मै एक सैनिक हारा सा
बिगड़ी दिल की दुनिया , सोचा इक झूठ से सवारें
बरबाद गुलिस्तान , गर्दिश में सितारें
कौन है साथ , अब किसका नाम पुकारें
तुम्हे आदत थी गुलों की नजाकत की
रंगों आब की , खुशबुओं की बस्ती में खिलखिलाने की
मुझे आदत थी , जख्मों को हरा रखने की , जखम पे जखम खाने की
तभी इक झूठ कहा था तुमसे
वो झुक के मेरी निगाहों में झांकना
मुस्कुराने से तुम्हारे, वीरानो में छाने लगी थी बहारें
दिल के जख्म भरने लगे थे
बस यूँ ही हम तुमसे मोहब्बत करने लगे थे
कहता है मगर खुदा सबसे
हो जिससे दिल की लगी ना झूठ कहना कभी उससे
रेत की बुनियादों पे महल नही बना करते
हारे से सैनिक कभी शहज़ादे नही हुआ करते
हो के रुसवा तुमसे ये दिल पुकारे
मोहब्बत सच थी झूठ झूठा था
इक कमसिन सी हँसी पे ये आशिक लुटा था
बरबाद है गुलिस्तान , गर्दिश में सितारे
कौन है साथ अब किसका नाम पुकारें "

" तनहा आदमी "


"बोझिल है हवा, सर्द मगर चांदनी है
अँधेरी है दुनिया दिल की , बस बाहर रौशनी है

रोज़ मिलते हैं , मुझसे लोग बहुत
सब कहते हैं , तनहा बहुत ये आदमी है

गुमहो गई वफ़ा , खो गई मोहब्बतें
फ़िर भी कहते हैं की , बाकी ये जिंदगानी है "

Saturday, August 1, 2009

" यादें "


"यादें तो बहुत आती हैं , तुम्हारी , तनहा शामों में

भर जाती हैं , अश्कों के जाम नज़र के पैमानों में

यूँ तो हर घड़ी चेहरे पे चढा है नकाब, मुस्कराहट का

सितम ढाती यादों के दर्द, देखे तो ज़रा कोई, मेरे कागजी जज्बातों में

अपनाना बहुत मुश्किल है ये सच की , वक्त ना कभी थमा होता है

जो हैं दिल के करीब आज, कल उन्ही से जुदा होना होता है

फ़िर आएगा कभी उन यादों का लंबा काफिला

लाख तडपे दिल, मगर ना रुकेगा वक्त का ये सिलसिला

तब निकलती है दिल से इक आवाज़ , की तुम आ जाओ मेरी जिन्दगी के वीरानो में

क्योंकि यादें तो बहुत आती हैं तुम्हारी तनहा शामों में

और भर जाती हैं , अश्कों के जाम नज़र के पैमानों में "

Wednesday, July 29, 2009

सुबह मेरे शहर की


"मुझको पसंद है सुबह मेरे शहर की , शाम मेरे शहर की

वो महक मेरी मिटटी की , वो रौनक मेरी मोहब्बत की

वो रौशनी कारखाने की च्म्नियों की , मुंह अंधेरे लगती एक बड़े जहाज सी

ब्रेड वाले के भोंपू की बुलंद आवाज़

स्कूल जाते बच्चों की नन्ही फौज सी

मुझको पसंद है सुबह मेरे शहर की, शाम मेरे शहर की

अक्सर पूछते हैं , लोग मुझसे, ऐसा तुम्हारे शहर में क्या ख़ास है

कहता हूँ मै उनसे, नही कुछ ख़ास, मगर जो आम है, वो सब जगह ख़ास है

यहाँ की फिजा में बड़ा सुकून है , यहाँ की हवा बड़ी रूमानी है

और जब भीगती है ये बस्ती , चमचमाती है सड़के लहराती नागिन सी

मुझको याद नही, यहाँ से अच्छा कोई नमूना ,खुश्जहान का

कहते हैं इसे फौलाद का शहर, मगर ये तो बच्चा है , हिन्दुस्तान का

वो कॉलेज की राह में भीग कर जाना कभी टकराना कभी मुस्कुराना

ना कोई फिकर है यहाँ , ये तो मोहब्बतों का जहाँ है

इसकी मोहब्बतें भी हैं, बड़ी मासूम सी

मुझको तो पसंद है सुबह मेरे शहर की, शाम मेरे शहर की

वो महक मेरी मिटटी की, वो रौनक मेरी मोहब्बत की "

Tuesday, July 28, 2009

"बेबाक मोहब्बत" (हास्य कविता)


"कभी सुना था की , बेबाक मोहब्बत, इबादत होती है

आज कल ये मोहब्बत, खुले रास्तो और बाग बगीचों में सरे आम दिखती है

करते हैं गुटर गूं इश्क के कबूतर खुले आम

आँखें बंद कर ले जिसे देख कर जलन होती है

मिलते थे कभी आशिक छुप छुप कर
शर्मों लिहाज़ के पर्दों में भी रहते थे डर डर कर

अजी वो ज़माना न रहा अब, बढ़ गई मोब्बत अब तो नारी से नर तक

पहले तो आई पी एल की तीन सौ छिहत्तर ही थी, अब है तीन सौ सतहत्तर तक

जाने ये कैसी मोहब्बत है, जो बदनामी से भी न डरती है

क्या जवान क्या बूढे सबके सामने 'निशब्द ' रहती है

के बेबाक मोहब्बत का अब तो ज़माना है

आज हमें नए हमसाये से मिलने जाना है

चाँदनी भी अब तो रोज़ नए आसमान के आगोश में सोती है

और भूल कर पिछली बातें , हर दिन नया और हर रात हसीं होती है

ना वादों की परवाह, ना कसमों का इरादा

छुपाना कम और आज है, दिखाना ज्यादा

शरीफ लोग भी अब तो कभी कभी ही बाहर आते हैं

तीन सौ चौंसठ दिन सोते हैं ,वैलेंटाइन डे पर ही जागते हैं

अजी हमें क्या पड़ी है , हम क्यों परवाह करेंगे

ये तो हमारी भी ख्वाहिश है, के एक दिन हम भी सीरियल किसर बनेंगे

के जिन्हें परवाह है, वो जनता दुनिया से डरती है

हमारी नज़रों में तो यूँ ही, बेबाक मोहब्बत हुआ करती है "














"हुस्न वाले यूँ ही ना मुस्कुराया करो "




"हुस्न वाले यूँ ही ना , मुस्कुराया करो

हंस कर बातों बातों में, यूँ ही रूठ जाया करो
इक राज़ थे हम जिसे जानते हैं वो
आहट भी हमारी, ना आजकल, पहचानते हैं वो
ख़्वाबों के हसीं ,वो बस्ती मेरी ,एक पल में ना उजाडा करो
और बहुत पाक है मोहबत मेरी , इसपे ना शक किया करो
हुस्न वाले यूँ ही ना मुस्कुराया करो
हंस कर बातों बातों में ,यूँ ही ना रूठ जाया करो "

Sunday, July 26, 2009

" मुर्गे की हलाली " (हास्य कविता)


"एक बार पूछा हमसे किसी ने

कहो मित्र क्या हाल है

हमने कहा , वही हड्डी वही खाल है

उसने कहा बड़े खुश नज़र आते हो

चहके चहके से चले जाते हो

ना होली है , ना आज दीवाली है

फ़िर चौखटे पे तुम्हारे क्यूँ छाई ये लाली है

हमने कहा मित्र राज ये बड़ा गहरा है

मंजर दिल का हमारे, बड़ा सुनहरा है

पेट के इंतजाम ने सबकी नींद उड़ा ली है

ऊपर से पालतू चिडियों से और आफत बड़ा ली है

पक् - पक् कुक्दुक कू , से मोहल्ला परेशान था

सबकी नज़रों में एक शातिर मुर्गा जवान था

उसका इलाज ढूँढ कर छाई खुशहाली है

सब यार भाई आना , आज घर पे , क्योंकि आज...

मेरे मुर्गे की हलाली है "


Saturday, July 25, 2009

" मुस्कराहट "


1"यूं लगता था की सब कुछ लुटा देंतेरी इक मुस्कराहट पे

लुट कर ही तो हमने जानाकी क्यों तुम्हे मुस्कुराने की आदत है "
२। "हवा के इक झोंके से जब, बादल का कोई टुकडा हटता है
तब तेरे सुर्ख होठों से , मुस्कुराहट का शहद टपकता है
बरसती है तेरे चहरे से, बेहिसाब मासूमियत
सहर की रौशनी से जब ,कुहरा कोई छंटता है
शाम-ओ -सहर तो बहाने हैं , बस तेरी पलकों के झुकने उठने के
मासूम सितम पे तो तेरे , आसमां भी झुकता है
बहुत गिरा मै, जिन्दगी की राहों में
वो तो बस, मेरे सुकून का ही रास्ता है
बस अब तो यही कहता हूँ की,
ख्यालों में मेरे भी ,चाँद कोई इक बसता है "