संदेश

“आरज़ू”

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आरज़ू जब भी कभी गुज़रूँ तेरी गली से   एक पुराना सा मकाँ याद आये जलते क़दमों को , बेलगाम उखड़ती साँसों को आराम आ जाये ठहर जाती है उम्र उस वक़्त आज भी जब भी कभी ज़ुबान पे तेरा नाम आ जाए हम तो सीने में समंदर दबाए बैठे थे जाने कब से   यही सोच कर की वो आयें या उनका कोई पैग़ाम आ जाये ”

दुनिया

 “ हमने तो दुनिया भी बना डाली थी ख़्वाबों की , कुछ इशारों पे तुम्हारे और एक तुम थे जो मुकम्मल हाँ भी ना कह पाये ” लगता है कभी कि तुम्हें कुछ याद भी नहीं एक हम थे जो कभी हुआ ही नहीं , वो भी ना कभी भुला पाये जाने कितना तेज़ चलता है वक़्त भी और शायद तमन्ना उससे भी तेज़ लगता है जैसे कल ही की बात हो कुछ गुलाब मेरी किताबों में सूखे भी नहीं ठीक से और बाग़ की शाख़ों पे आज फिर नए गुल खिल आये ”  बस इक चेहरा भर ही तो ना थे तुम मेरी ख़ातिर इक उम्मीद का आसमान , एक बारिश की फुहार थे जो मै थक के बैठ भी जाता छांव में जिसकी वो ठण्डा सा दरख्त भी तो थे जाने कितनी तेज़ थी वो वक़्त की आँधियाँ की आज कोई निशाँ भी ना नज़र आये ”

शिकवे

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“ना चमकते हैं आईने उम्मीदों के ,   ना खिलते गुलाब अरमानों के   बहती तो बहुत हैं भीगी हवाएँ मगर  होते नहीं तर, साये जज़्बातों के   वो करता है करम हम पे तो खूब   मगर शिकवे रह ही जाते हैं  अधूरे ख्वाबों के” (अनिल मिस्त्री)

ख्वाहीश है दिल की

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“भीगी सी बादलों भरी वादी दरिया के किनारों पर घना सा छाता कोहरा और  शाम के आग़ोश मे सिमटती दिन की रौशनी कुछ अंधेरे, कुछ उजाले बदलते रँग तेरे चेहरे के,  थोड़े सहमे ,थोड़े मुस्कुराते से  और बमुश्किल जलती आग , धीमी सी बारिश की फुहारों में धुलता, रौशन सा चेहरा तेरा  शर्माती निगाहों में, कुछ मचलते से ख़्वाब और आहिस्ता-आहिस्ता आबाद होती ,आज ज़िंदगी थाम कर  कंपकंपाती हथेलियों को तेरी बस ये ही कहना है , की ख्वाहिश है दिल की, कि ये वक़्त ना गुज़रे कभी” (अनिल मिस्त्री)

"दस्तूर "

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"कभी बह भी जाऊं कभी रह भी जाऊं  इस वक़्त क़ी मौज के साथ   कभी इक कतरा बन के छलक जाता मै अश्क का   कभी महकता फिरूं गुलशन में गुलों के साथ   कभी देख दिल भी दुखता है गाफिलो को क़ी क्यूँ जी रहे   कभी हंसता हूँ खुद पे क़ी कितनी दूर से वापस आ गया मै वक़्त के साथ   कहते तो सब है सैकड़ो किस्से अपने -अपने   मगर ना बदलता दस्तूर ज़माने का वक़्त के साथ   और कभी ना मिलती मिठास किसी को कांटे बोने के बाद " (अनिल मिस्त्री)

एक कोना शिकस्त का

इक कोना शिकस्त का यु तो उमर गुजार दी बख्तर बंद पहने हुए बहुत सेक ली पीठ घोड़ो क़ी भी शमशीर और भाले भी जुड़ गए है हथेलियों से और बहुत किस्से भी है फ़तेह के कई है जिनकी चाहत है हमसा बनने क़ी भी मगर सिर्फ हमें मालूम है जिंदगी क़ी चार दीवारी में इक कोना है शिकस्त का चाहो तो जीत लो ये दुनिया मगर ये कोना रहेगा शिकस्त का झुकाए है सर सजदो में इस कोने क़ी खातिर बहाया है खू भी मगर प्यासा है फिर भी ये टुकड़ा दिल की जमीन का और जीत कर भी सारी दुनिया रह गया घर में अपने ही एक कोना शिकस्त का

आनंद सागर

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“जीवन एक आनंद सागर है समय का उन्माद नहीं जीवन सम्भावनाओ की क्रीडा और विजय श्री का उल्लास पर्व है पराजित हो कर दुःख मनाने का नाम नहीं जीवन स्वयं एक व्यवस्था है स्वार्थपरक कृत्रिम व्यवस्थाओ का जाल नहीं क्रोध लोभ उन्माद और मोह जीवन के नश्वर नगण्य अंग है जीवन क़ी मूलभूत इकाई नहीं समानताओ में विशिष्ठ बनना व्यक्तित्व हो ऐसा मानो भरी भीड़ में दिव्य ललाट हो चमकता सदैव उत्साह, उल्लास और ऊर्जा से भरे मानो खिलखिलाता निर्झर हो बहता क्षोभ और भय से ग्रसित ह्रदय का काम नहीं जीवन एक आनंद सागर है समय का उन्माद नहीं आनंद से भरे आनंद बिखेरते जिसकी सहजता क़ी प्रशंसा संसार हो करता जैसे उज्जवल रश्मियों के मध्य नीले व्योम में दिनकर हो चमकता आत्म प्रशंसा और दंभ में लिपटे जुगनू का नाम नहीं जीवन आनंद सागर है समय का उन्माद नहीं लगा सके विराम जो उद्यमी क़ी पतवार को सिन्धु क़ी लहरों में वो बल नहीं माना है सदैव संसार ने गिर कर उठने वाले के लिए असंभव कुछ नहीं सदैव चुनौतियों को स्वीकारने का नाम है उस संघर्ष का नाम है जो धूप काले मेघो से करती धरा से मिलने ...