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"कुछः इस तरह"

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कुछः इस तरहः इक खिलता है गुल् , कुछः इस तर"हः जिन्द्गानी मे है वो रह रह के महके, मानो गुलाबो का अर्क हो यू तो आदत नही हमको रेशमी राहो की बस एक मखमली संदल् सा है वो कुछः मदमाती सी लहर सी कुछः सब्ज़्बाग् सा मन्जर इक ऊन्ची पहाडी पर बाद्लो को चूमती ओस मे भीगी हरियाली है वो हमको तो मालूम भी नही की, है क्या बस मेरी खुशहाली की कहानी है वो" (अनिल मिस्त्री)

"कुछः बाते"

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"कुछः बाते रह रह कर मेरे कानो मे आ जाती हैं एक रन्गीन से पुराने थैले मे से जैसे ,यादो की नयी तितलिया निकल आती हैं वो झूम के चलना यारो के साथ् कुछः मीठी चाय की चुस्किया, फ़ीकी मत्ठियो के साथ् मानो दिल की कोइ मुराद पूरी हो जाती है यु तो कितना भटका मे ज़माने की राहो पे मगर जाने क्यो आकर इस जमीन पे हर तलाश खतम हो जाती है मानो जन्ग से आये किसी सैनिक की माशुका की बाहो मे रात गुजर जाती है कभी बारिशो की साफ़् धुलति सडक कभी महकती आम की बौर् की खुशबू हर फ़िज़ा जिस जहान की मुज्हे गले लगाति है सच कहता हू जहान की किसी जन्नत मे वो बात नही जो मुजःको इस मिट्टी मे नजर आती है ये वो जमीन है जिसमे घुली है मेरे बचपन की कहानिया मेरे श्खसियत के किस्से , मेरे अतीत की, मेरे सपनो की बुनियादे ये मोह्ब्बत है मेरी जो मुजःको पास बुलाती है और बरसो बाद भी आज इस जमी की धूल को माथे पे लगाने की ख्वाईश् हो जाती है कुछः बाते रह रह के मेरे कानो मे आती है और फ़िर् से जिन्दगी के पुराने थैले मे से यादो की नयी तितलिया निकल आती हैं "

"वीराने"

"रातो की खमोशियो को मिलने के बहाने आ गये कुछः भारी अल्फ़ाज़् लबो के किनारे आ गये यु तो कम ही रही , खुश्नुमा सी ये ज़िंदगी इक बार फ़िर् दिन पुराने आ गये ये क्या कश-म-कश लगी है जीने की कुछः ख्वाब् सजाने की कुछः भाग जाने की कुछः अपनी जमी मे खो जाने की उमर भर लड कर , अब लगता है क्या ही मज़ा आया, ज़िंदगी भर लड़कर जो आज हर तरफ़् वीराने छा गये "

"गम "

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"कुछः बात है कुछः अफ़्साना है कुछः गम है कुछः तराना है इक पुरानी सी आदत है ज़िन्दगि की हर खुशी के साथ् गम को भी आना है चन्द चिराग जल जाया करते हैं बहुत खून बहाने के बाद इक झोन्के को आन्धी के , घना अन्धेरा कर जाना है यु तो बहुत हैं साथ् चलने वाले जाने कहा मगर हमसाये का ठिकाना है " (अनिल मिस्त्री)

"दुनिया "

"दुनिया " "ये दुनिया कभी बडी बेजार लगति है ज़िन्द्गी बस मौत् का इन्त्ज़ार् लगती है करे क्या हम बयान हाल-ए-दिल किसी से सबकी नीयत अब तो बेकार लगती है "

"जाने दिल क्यू भारी है आज"

"जाने दिल क्यू भारी है आज इक अजीब् सी उदास रात महकी चान्द्नी कुछः दूर कुछः पास कुछः तूटते ख्वाब् कुछः बेजान अरमान कुछः अपनो के अश्को कि बरसात और कुछः अजीब् सी पशोपेश मे फ़न्सा इक इन्सान इक मोह्ब्बत से बसायी बस्ती मे सुलगति इक ज़िन्दा आग जाने दिल क्यू भारी है आज इक अजीब् सी उदास रात कुछः वक़्त भी आगे सा निकल चुका कुछः ज़माना नया सा हो चुका अब सजा क्या दे हम खुद को इक दिल भी अपना रहने वाले भी खास जाने दिल क्यू भारी है आज "

तमन्ना

"तमन्ना " "कुछः हूर कि ख्वाइश् थी कभी चान्द् का इराद था इक महका सा गुलाब् था कभी ख्वाबो मे हर दुआ मे जिसको मान्गा था इक सादगी मे लिप्टी वो वो तमन्ना मेरी मिली कुछः इस कदर के पता ही नही चला यहि थी वो जिसको हमे पाना था " (अनिल मिस्त्री)