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Tuesday, July 8, 2014


ना चटखते हैं आईने उम्मीदों के , ना खिलते गुलाब अरमानों के बहती तो बहुत हैं भीगी हवाएँ मगर होते नहीं तर, साये जज़्बातों के वो करता है करम हम पे तो खूब मगर शिकवे रह ही जाते हैं अधूरे ख्वाबों के

Thursday, May 31, 2012

ख्वाहीश

नाराज़ तो नहीं कभी खुद से मै मगर मुक्कम्मल खुश भी नहीं दिल तो बहुत करता है क़ी शरीर बन जाऊं मगर अपनों क़ी खातिर संजीदा हूँ चंद चुभते सवालो से रोज लगता है के शायद जी के भी मै जिन्दा ही नहीं और बदतर होते रिश्तो को देख लगता है क्यूँ करते रहे बूढ़े इक और क़ी ख्वाहीश क्या जिंदगानी में मुश्किलें यूँ भी कम रही

Tuesday, April 3, 2012

"दस्तूर "

"कभी बह भी जाऊं कभी रह भी जाऊं इस वक़्त क़ी मौज के साथ कभी इक कतरा बन के छलक जाता मै अश्क का कभी महकता फिरूं गुलशन में गुलाबो के साथ कभी देख दिल भी दुखता है गाफिलो को क़ी क्यूँ जी रहे कभी हंसता हूँ खुद पे क़ी कितनी दूर से वापस आ गया मै वक़्त के साथ कहते तो सब है सैकड़ो फलसफे और किस्से अपने -अपने ज़माने के मगर ना बदलता दस्तूर ज़माने का वक़्त के साथ और कभी ना मिलती मिठास आमो क़ी किसी को कांटो के बीज बोने के बाद "

Wednesday, March 28, 2012

एक कोना शिकस्त का

इक कोना शिकस्त का

यु तो उमर गुजार दी बख्तर बंद पहने हुए

बहुत सेक ली पीठ घोड़ो क़ी भी

शमशीर और भाले भी जुड़ गए है हथेलियों से

और बहुत किस्से भी है फ़तेह के

कई है जिनकी चाहत है हमसा बनने क़ी भी

मगर सिर्फ हमें मालूम है

जिंदगी क़ी चार दीवारी में

इक कोना है शिकस्त का

चाहो तो जीत लो ये दुनिया मगर

ये कोना रहेगा शिकस्त का

झुकाए है सर सजदो में इस कोने क़ी खातिर

बहाया है खू भी

मगर प्यासा है फिर भी ये टुकड़ा दिल की जमीन का

और जीत कर भी सारी दुनिया

रह गया घर में अपने ही

एक कोना शिकस्त का