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Thursday, May 31, 2012

ख्वाहीश

नाराज़ तो नहीं कभी खुद से मै मगर मुक्कम्मल खुश भी नहीं दिल तो बहुत करता है क़ी शरीर बन जाऊं मगर अपनों क़ी खातिर संजीदा हूँ चंद चुभते सवालो से रोज लगता है के शायद जी के भी मै जिन्दा ही नहीं और बदतर होते रिश्तो को देख लगता है क्यूँ करते रहे बूढ़े इक और क़ी ख्वाहीश क्या जिंदगानी में मुश्किलें यूँ भी कम रही

Tuesday, April 3, 2012

"दस्तूर "

"कभी बह भी जाऊं कभी रह भी जाऊं इस वक़्त क़ी मौज के साथ कभी इक कतरा बन के छलक जाता मै अश्क का कभी महकता फिरूं गुलशन में गुलाबो के साथ कभी देख दिल भी दुखता है गाफिलो को क़ी क्यूँ जी रहे कभी हंसता हूँ खुद पे क़ी कितनी दूर से वापस आ गया मै वक़्त के साथ कहते तो सब है सैकड़ो फलसफे और किस्से अपने -अपने ज़माने के मगर ना बदलता दस्तूर ज़माने का वक़्त के साथ और कभी ना मिलती मिठास आमो क़ी किसी को कांटो के बीज बोने के बाद "

Wednesday, March 28, 2012

एक कोना शिकस्त का

इक कोना शिकस्त का

यु तो उमर गुजार दी बख्तर बंद पहने हुए

बहुत सेक ली पीठ घोड़ो क़ी भी

शमशीर और भाले भी जुड़ गए है हथेलियों से

और बहुत किस्से भी है फ़तेह के

कई है जिनकी चाहत है हमसा बनने क़ी भी

मगर सिर्फ हमें मालूम है

जिंदगी क़ी चार दीवारी में

इक कोना है शिकस्त का

चाहो तो जीत लो ये दुनिया मगर

ये कोना रहेगा शिकस्त का

झुकाए है सर सजदो में इस कोने क़ी खातिर

बहाया है खू भी

मगर प्यासा है फिर भी ये टुकड़ा दिल की जमीन का

और जीत कर भी सारी दुनिया

रह गया घर में अपने ही

एक कोना शिकस्त का

Wednesday, March 21, 2012

आनंद सागर




जीवन एक आनंद सागर है

समय का उन्माद नहीं

जीवन सम्भावनाओ की क्रीडा

और विजय श्री का उल्लास पर्व है

पराजित हो कर दुःख मनाने का नाम नहीं

जीवन स्वयं एक व्यवस्था है

स्वार्थपरक कृत्रिम व्यवस्थाओ का जाल नहीं

क्रोध लोभ उन्माद और मोह जीवन के नश्वर नगण्य अंग है

जीवन क़ी मूलभूत इकाई नहीं

समानताओ में विशिष्ठ बनना

व्यक्तित्व हो ऐसा मानो भरी भीड़ में दिव्य ललाट हो चमकता

सदैव उत्साह, उल्लास और ऊर्जा से भरे

मानो खिलखिलाता निर्झर हो बहता

क्षोभ और भय से ग्रसित ह्रदय का काम नहीं

जीवन एक आनंद सागर है

समय का उन्माद नहीं

आनंद से भरे आनंद बिखेरते

जिसकी सहजता क़ी प्रशंसा संसार हो करता

जैसे उज्जवल रश्मियों के मध्य

नीले व्योम में दिनकर हो चमकता

आत्म प्रशंसा और दंभ में लिपटे जुगनू का नाम नहीं

जीवन आनंद सागर है

समय का उन्माद नहीं

लगा सके विराम जो उद्यमी क़ी पतवार को

सिन्धु क़ी लहरों में वो बल नहीं

माना है सदैव संसार ने

गिर कर उठने वाले के लिए असंभव कुछ नहीं

सदैव चुनौतियों को स्वीकारने का नाम है

उस संघर्ष का नाम है जो

धूप काले मेघो से करती धरा से मिलने को

थक कर हार जाने का नाम नहीं

जीवन एक आनंद सागर है

समय का उन्माद नहीं

जीवन चिडियों का मधुर कलरव है

स्वार्थ के कोलाहल का नाम नहीं

उच्च मनोबल के बल पर दुष्टों को झुका देने का नाम है

और सद्विचारो के पद चिन्ह समय क़ी रेत पर छोड़ जाने का नाम है

छल से धन,पद,वैभव के ढेर पर बैठ इतराने का नाम नहीं

जीवन एक आनंद सागर है

समय का उन्माद नहीं

मृत होकर भी स्मृतियों में अमरत्व को पाने का

सूक्ष्मता से पूर्णता को पाने का

और स्वप्नों के वास्तविकता बन जाने का

अमावस क़ी कृष्ण शून्यता से

पूनम की उज्ज्वलता क़ी यात्रा का

और देख सुप्रभात, पंकजो के पल्लवित हो जाने का नाम है

अज्ञान में अलसाए अजगर का नाम नहीं

जीवन एक आनंद सागर है

समय का उन्माद नहीं

वजह बेवजह मुस्कुराने की

"आते है कुछ यार अपने आशियाने मै बैठ कर

मगर सिखलाते है बाते ज़माने के दस्तूर क़ी

यु तो कमी नहीं गाफिलो क़ी ज़माने में

खता बस इतनी क़ी अपनी दिल तोड़ने क़ी आदत नहीं

कुछ भी कर लो शिकायत रह ही जाती है ज़माने को

बस काट लो कुछ पल महफ़िल में ख़ामोशी से

ये भी तो वजह है , बेवजह मुस्कुराने क़ी "