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Wednesday, May 26, 2010

"आई . टी .प्रोफेशनल की व्यथा "

"किससे कहें हम व्यथा हमारी
स्वचालित डिब्बे के सामने बैठ
सींचते अपने सपनो की फुलवारी
चंद बंद ठंडी दीवारों में
सर्वेरों से उलझते , चलती जीवन की गाड़ी
किससे कहें हम व्यथा हमारी
इक समय था जब मन मदमस्त पंछी था
नीला अम्बर , सौम्य सवेरा था
अब तो रचना क्या कल्पना भी होती
बाजार की मारी
और अति अल्प समय में होती
अनगिनत युद्धों की तैयारी
किससे कहें हम व्यथा हमारी
इक पल को भी क्षणिक ना माना जाता यहाँ पे
रहना हो इस दौड़ में तो गति बढ़ाना जहाँ में
चंद उँगलियों की खट पट में छिपी होती
सुनहरे या सुलगते भविष्य की कथा सारी
किससे कहे हम व्यथा हमारी
अनगिनत गणितीय गणनाओं में
सोच से भी तेज भागती , तकनीक हमारी
याद नहीं दिन रैन यहाँ पे
बस स्वचालित सी होती सोच हमारी
क्या दीपावली क्या होली सब, समझदार बक्सों के साथ
क्या रिश्ते , क्या प्रेम इस जगत में
हर दृश्य , बस इक मूषक की चटक के बाद
क्या प्रेम क्या रास क्या रंग क्या संगवारी
सोशल नेट्वोर्किंग के नाम पे विरक्त होती , ये दुनिया सारी
बालक होते जाते समझदार ,समय से पूर्व
स्नेह , प्रेम , छल , वर्तमान का हो गया अभूतपूर्व
ना दिखता बचपन , ना मिलती सरलता की छाप हमारी
किससे कहें हम व्यथा हमारी "

मेरा पहला लेख नवभारत पर

pyaare dosto mera pahla samajit lekh navbharat times par 23 May ko publish hua.

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5965413.cms?curpg=1

Tuesday, May 18, 2010

"सवाल"

कुछ समय पहले पढ़ा की माओवादियों ने दंतेवाडा में एक बस को उड़ा दिया लगभग ४० लोग हताहत हुए . अभी दंतेवाडा में C.R.P.F. के जवानों की बलिदान की घटना को पूरा एक महिना भी नहीं हुआ और अब ये दूसरी घटना. इसके अलावा हमारे एक जाने माने मंत्री जी कह रहे हैं की अभी भी हवाई हमलों की बात करना बेकार है नक्सलियों के खिलाफ और केंद्र सरकार राज्य सरकार पे आरोप प्र्त्यारोपे कर रही है . अब सवाल ये उठता है की :
. क्या हम नक्सलियों की किसी सियासी फायदे नुक्सान के लिए खुद ही बढ़ावा दे रहे हैं ? या केंद्र सरकार की विरोधी सरकार वाले राज्यों में नयी मुसीबतें पैदा करके उसे नकारा साबित करना चाहते हैं ? या किसी फुंसी का इलाज करने वाले डाक्टर का नाम नहीं होता इसलिए , उसे नासूर बना देना चाहते है ? और तब उसका इलाज किया जायेगा ?
पहले ही हमारे देश में २८ राज्यों में कम से कम २६ में कोई ना कोई समस्यां हैं , जो की क्षेत्रवादी हैं , इसके अलावा राष्ट्रव्यापी समस्याओं की कमी नहीं है . फिर हमारे एक शांत और छोटे से प्रदेश छत्तीसगढ़ में , जो अपनी शांत और साफ़ सुथरी छवि के लिए जाना जाता था , जहाँ की स्थानीय जनता चावल और हरी मिर्च की चटनी में खुश रहती थी , आज इतनी असंतोष और आक्रोश से कैसे ग्रसित हो गयी ? उनके पास आधुनिक हथियार और युद्ध कौशल में निपुण लोग कहाँ से आ गए जो अपने जबरदस्त युद्ध कौशल के दम पे C.R.P.F. और स्थानीय पुलिस पे भी भरी पड़ रहे हैं ? जिनके पास दो वक़्त का चावल नहीं था वो बारूदी सुरंगे कैसे बिछा रहे हैं और क्यूँ ?
और हमारी सरकार और सुरक्षा तंत्र उनके आगे बेबस कैसे हुआ जा रहा है ? और अगर हम इतने बेबस है जो नकसलियों के सामने घुटने टेक रहे हैं तो , फिर हम पाकिस्तान और चीन जैसे देशों की आपतिजनक हरकतों का कैसे सामना करेंगे ?
जब भी २६ जनवरी की परेड होती है , हम पूरी उत्सुकता से और गौरव के साथ उसे देखते रहे हैं , अपने बच्चों की बताते रहे हैं की ये हमारा देश है , जबरदस्त सामरिक शक्ति से संपन्न , दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र . हम सारी दुनिया में अपने शांत और प्रगतिशील मानसिकता के कारण प्रसिध्द हैं . हमने दुनिया को पालतू चिड़ियों से परिचित करवाया , गणित और दशमलव का अविष्कार हमने किया , हमने दुनिया को रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथ दिए . हमारे देश का बनाया सूत 'दूध की वाष्प' ( vapour of milk ) कहा जाता था . चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक जैसे राजाओं का और संतो का राज हमारे देश में रहा , जिसे utopiya (आदर्श राज्य ) कहा जाता है .इसके अलावा सदियों से हमने बाहरी मेहमानों का स्वागत किया , सारी दुनिया हमें लूटती रही हमें चोट और घाव देती रही मगर हम फिर भी उन्नति के पथ पे लगातार बढ़ते रहे किसी अविरल बहने वाले झरने की तरह .
सदा ही बाहर के लोगों ने हमें लूटा मगर हम सबका सम्मान करते रहे , लेकिन क्या सदा हम लोगो से खुद को लुटवाते ही रहेंगे ?
सदा हम सबकी बात सुनने को मजबूर ही रहेंगे ? चाहे हम सही हों या गलत ? जिस राष्ट्र की नीव रखने और उसे सदा सम्मान दिलाने की खातिर हमारे नौजवान शहीद होते रहे क्या हम और शहीद करवाते रहेंगे और इन्तजार करेंगे की कोई शांति वार्ता हो और बिगड़ी मानसिकता वाले शत्रु हमसे बात करने को राजी हो जाए ?
आज भी जब दंतेवाडा की घटना याद आती है तो मन में एक सवाल आता है की क्या हमने उन जवानों की खातिर कोई स्मारक बनवाया ? कोई मोमबत्ती जलने की श्रंखला शुरू की ? क्या किसी मंत्री या नेता ने किसी मंच पे किसी बड़े पैमाने पे उन जवानों के सर्वस्वा बलिदान के लिए दो शब्द कहे ? क्या हमने कोई राष्ट्र व्यापी शोक रखा ? नहीं , बल्कि हम I.P.L. में व्यस्त थे , और chearleadres की मदमस्त अदाओं और स्कोर बोर्ड पे हमारा सारा धयान था . क्या देश के किसी कोने में हो रही अमानवीय घटनाओ से हमारा कोई सरोकार नहीं ? या उदर पोषण और पेट पालने में हम इतने व्यस्त हैं की हमें किसी राष्ट्रव्यापी बात से कोई सरोकार नहीं है ? बस हमें उस बात के बारे में सोचना चाहिए जो हमें फायदा या नुक्सान पहुचती हो सिर्फ व्यक्तिगत रूप से ?
मेरे बहुत सारे सवाल हैं , जो शायद हर तरीके से सही भी ना हो , और बहुत सारे समझदार लोग इन पे तरह तरह की टिपण्णी भी करेंगे , मगर मेरा मानना ये है की ये सवाल हम सभी को पूछने चाहिए और सबसे पहले अपने आप से पूछने चाहिए की जिन लोगों ने अगर भारत का संविधान न पढ़ा हो वो किसी प्राथमिक स्कूल के बच्चे की हिंदी की किताब का पहला पन्ना पढ़े और जाने की ये राष्ट्र कोई हलवा नहीं जिसे हर कोई चम्मच से खा ले और अपना हिस्सा पाने के लिए लड़ता रहे . ये मिटटी कई बलिदानियों के खून से सींचती रही है और आगे भी सिंचेगी मगर अगर कोई सरकार या कोई फैसला चाहे वो किसी भी स्तर पे होता हो और वो गलत हो तो हमें उसके बारे में अपने busy shedule से समय निकल कर सोचना चाहिए और विरोध भी करना चाहिए . वरना हमारे देश का हर हिस्सा जम्मू कश्मीर या तमिल आतंकियों से ग्रसित श्रीलंका जैसा हो जायेगा .शायद तब हम जागे , मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी .
वंदे मातरम

Monday, May 17, 2010

"तश्तरी के चावल "


"हर आहट पे नजरें हमारी दरों पे टिक जाती रही

बस वो ना आये जिनका हमें इंतज़ार था

यु तो छानी हैं ख़ाक बहुत सी राहों की मगर

बस वो राह ना मिली जिससे लिपट के मिट जाने का ख्वाब था

हर दरों दीवार पे जा के देखा,

हर तस्वीर में उनको तलाश के देखा

निगाहों से अपनी ये जमना बदलते देखा

अपने बाग़ की हरियाली सा कही आलम ना था

कुछ धीरे से कानो में रस घोल के चले जाते रहे वो

शायद इकरार-ऐ-इश्क ही कर जाते रहे वो

बहुत परोसे हैं ज़माने ने पकवान सामने हमारे

मगर मेरे घर की तश्तरी के चावल सा कहीं स्वाद ना था"

Sunday, May 16, 2010

गलत पाठ

गलत पाठ

आज एक अखबार में पढ़ा की छत्तीसगढ़ में बाकी राज्यों , विशेषकर (हरियाणा ) खाप पंचायतों की तरह उल जलूल फैसलों के कारन और समान गोत्र में विवाह करने वालों को सजा देने के कारण , आजकल सुर्ख़ियों में है , छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही दकियानूसी फैसला सामने आया. जहां साहू समाज में सामान गोत्र में विवाह करने के जुर्म में एक दंपत्ति को हाथ में गंगा जल लेकर ये कसम खाने को मजबूर किया गया की वो अब पति पत्नी नहीं है . जबकी वे दोनों करीब २५ सालों से पति पत्नी थे . इस दुःख में पत्नी ने आत्महत्या कर ली , उनके ३ बच्चे हैं और १ बच्चा नाबालिग है . उन बच्चों का भविष्य क्या होगा ये तो भगवान् ही जाने , मगर कुछ सवाल आज हमरे सामने खड़े हो जाते हैं ऐसे बेहूदे फैसलों और बेतुकी हरकतों से .
१. अगर उस दंपत्ति का विवाह गैर सामाजिक था तो २५ सालों तक क्या साहू समाज सो रहा था ?
२. अगर खाप पंचायतों की इतनी चलती है तो वो सभी विवाहों में अपना दखल क्यों नहीं देते ?
३. क्या वो समाज उन बच्चों के बारे में भी कुछ सोच रहा है जो अब बगैर माँ के रह रहे हैं ?
४. क्या उस व्यक्ति की खोज खबर वो समाज ले रहा जो व्यक्ति इस फैसले से सबसे ज्यादा आहत हुआ है ?
५.और क्या उनका अगला निशाना उन सभी सामान गोत्र वाले जोड़ो पे है जो विवाह कर चुके हैं ? या ये फैसला किसी व्यक्तिगत शत्रुता से प्रेरित था
६. और सबसे बड़ा सवाल की क्या पुलिस प्रशासन सो रहा था जब ये सब कुछ प्रदेश की राजधानी में हो रहा था ?
ऐसे फैसले हमारी मानसिक विकलांगता को प्रदर्शित करते हैं , और साथ ही ये बतलाते ही की हमने कभी हरियाणा या किसी अन्य प्रदेश की उन्नति और विकास की बात नहीं सीखी , अगर कुछ सीखा तो खाप पंचायतों के गैर समझदार और गंवार पने को प्रदर्शित करने वाली मानसिकता की नक़ल सीखी . हमने सही पाठ तो सीखा या नहीं ये तो मालूम नहीं मगर गलत पाठ जरूर सीखा है .
हमने दूसरे राज्यों से नक्सलवाद सीखा , अपराध सीखा , भ्रस्टाचार सीखा है , और रही सही कसर हमने खाप पंचायतों से सीख ली .
क्या हमने कभी गुजरात की आर्थिक और व्यवसायिक उन्नति की नकल सीखी ? या कभी महाराष्ट्र और हरियाणा की उन्नति की नक़ल सीखी ?
नहीं मगर हमने गलत पाठ जरूर सीख लिए .
मै सिर्फ इतना कहना चाहूँगा सभी लोगों से की क्या हम अपने प्रदेश को उन्नति की तरफ ले जा रहे हैं या बर्बादी करने और खुद को बदनाम करने के लिए हमने छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण करवाया है ? क्या हम ये सुनना पसंद करेंगे की छत्तीसगढ़ में छत्तीस समस्याएँ अपने फिर फैला रही है ?

Sunday, May 2, 2010

जवाब

पदार्थवादी सोच और जरूरत से ज्यादा व्यावसायिक दृष्टिकोण का नजरिया है की , हमारे देश में गद्ददार और लालची लोगों की भीड़ बढती जा रही है , फिर वो चाहे किसी भी क्षेत्र की बात क्यों न हो . आजकल माधुरी गुप्ता के कपड़ों और lipstick के रंग की बहुत चर्चा चल रही है . अपने देश की गुप्त दस्तावेजों की नीलामी करने वाले इंसान को किसी फ़िल्मी superstar की तरह बताया जा रहा है . और हम खुल के इसलिए नहीं बोल पा रहे हैं की , अब तक जुर्म साबित नहीं हुआ है . ये benifit of doubt का महामंत्र अक्सर गद्दार और मुजरिम (बड़े तबके के ) उठाते रहे हैं , फिर वो चाहे अजमल कसाब हो या निठारी का पंधेर या आरुशी हत्याकांड के अपराधी या फिर ताज़ा तरीन माधुरी गुप्ता . हमारी न्यायप्रणाली ज्यादातर मामलों में केवल सबूत जुटाने और कहीं किसी निर्दोष को सजा न मिल जाये इस खोज बीन में ही बहुत लम्बा समय ले लेती है. इस लम्बे समय अंतराल को ही ज्यादातर high class अपराधी ढाल बना कर इस्तेमाल करते हैं और कानून व्यवस्था को चिढाते नज़र आते हैं.
मगर मेरा सवाल ये है की , आखिर अजमल कसाब और माधुरी गुप्ता जैसे जघन्य अपराधों में , जहाँ दूसरे देशों में देशद्रोह की कड़ी से कड़ी सजा मिलती है , हमारे देश में आखिर कितने और कब तक सबूत पेश किये जायेंगे ? क्या हम अपने सुस्त रवैये और ढीली कार्यप्रणाली का नाम लेकर इस जैसे अपराधियों को बढ़ावा दे रहे हैं ? तकरीबन १००० के आस पास गवाहों और कई ठोस सबूतों के बावजूद , अभी तक कसाब जिंदा है ? निठारी वाला पंधेर आजाद घूम रहा है , ऐसे उदाहरण क्या और नए आतंकवादी हमलो और अमानवीय हरकतों को निमत्रण नहीं देते ? एक तरफ एक ऐसी भीड़ है जो मरने मारने और हमारे देश का हर तरह से नुक्सान करने को तैयार बैठी है . और एक तरफ हम है जो सिर्फ शोरे मचाने और जरूरत से ज्यादा ढील देने पे आमदा हैं . और यही नहीं हम खुद कार , मोबाइल , धन, दौलत और अपने ऐशो आराम और अय्याशियों के लिए नैतिक रूप से इतने गिरते जा रहे हैं जो की हम ना अपने राष्ट्र की चिंता कर रहे हैं , और ना ही अपनी अस्मिता की . क्या आज हमारे साथ ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ गयी है जो भारत को फिर गुलाम बना देना चाहते हैं ?
क्या दंतेवाडा , जैसी घटनाओं में हवाई हमलों जैसे ठोस क़दमों की पहल करना इतना मुश्किल है ? क्या हम इतने नाकाम हैं की कोई भी हमें डरा धमका सकता है ? चाहे वो कोई बड़े ताकतवर देश हो , या आतंकवादी , या फिर नक्सली ? ये सब बातें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और एक सामरिक शक्ति संपन्न देश को शोभा नहीं देती .
आज वक़्त है ईंट का जवाब पत्थर से देने का , जो थपड मारे उसका हाथ तोड़ देने का , कुछ ऐसा करने का की कोई इस देश के लोगों को नाकाम और डरपोक ना समझे .दुनिया जान जाये की जब बात हमारी अस्मिता की आएगी तो हम ये साबित कर देंगे उन दंतेवाडा के CRPF के वीर रणबांकुरों और कारगिल में शहीद हुए हमारे जवानों की तरह बलिदान करने और अपने शत्रु के दांत khatte कर देने में सक्षम हैं . फिर चाहे शत्रु घर के अन्दर का हो या बाहर का.
"यूँ ही गिरता नहीं लहू अक्सर , इस मिटटी के दीवानों का
सैलाब सा उठ जाया करता है रगों में अपनी ,दुश्मनों से इन्कलाब का "