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Sunday, August 21, 2011

"सच्चे वीर "

मेरी एक माइक्रो पोस्ट चलते चलते :


वक़्त क़ी कमी क़ी वजह से लिखना बहुत कुछ कम हो गया है , मगर कभी बंद नहीं होगा , क्योंकि साँस तो चलती ही रहती है |
और मेरी कलम साँस के साथ ही बंद होगी | लिखने को तो बहुत कुछ है मगर पेट के आगे दिल अकसर इस दुनिया में छोटा पड़ जाता है|
और पेट क़ी जरुरत ज्यादा बड़ी हो जाती है |
मै हमेशा से अपने लेखो में देश क़ी वर्तमान हालत का , और लोगो क़ी अनभिज्ञता का जिक्र करता आया हूँ|
कभी अपना गुसा , कभी असंतोष कभी नाकामी, कभी एक बदलाव क़ी चाहत और कभी शायद अपनी कलम से कोई शुरुआत करने क़ी ख्वाईश करता आया हूँ | मगर आज "अन्ना हजारे " के बिगुल बजाने के बाद जो लहर उठी है उससे मुझे बड़ी खुशी होती है | कुछ लोगो को मैंने ये कहते भी सूना है क़ी अगर अन्ना क़ी लोकप्रियता का यही आलम रहा तो उनका लोकपाल बिल तो पास हो जायेगा , मगर शायद भारत में कमुनिस्म आ जाएगा और उन्मुक्त व्यवसाय और स्वतंत्र प्रतियोगिता का माहोल ख़तम हो जायेगा | जो क़ी भारत देश क़ी उन्नती का एक बड़ा कारण है |
कुछ लोग ये भी कहते है क़ी शायद वर्तमान प्रधान मंत्री को इस्तीफ़ा दिला कर राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बना दिया जायेगा और ये कांग्रेस क़ी एक बहुत बड़ी चाल है | कुछ कहते है क़ी ये भाजपा क़ी चाल है |
वजह चाहे जो भी रही हो मगर मै अगर अपनी बात करू तो , मेरे अन्दर जो एक असंतोष छट-पटाता था और लोगो क़ी देशभक्ती क़ी भावना को थोडा सा भूल जाने का वहम मेरे मन में था वो काफी हद तक दूर हो गया | क्योंकी हर गली हर मोहल्ले में हर जगह फिर से तिरंगे क़ी लहर दौड़ गयी है और इस वजह से इस बार का सवतंत्रता दिवस पहले से कही बेहतर लगा |
ये "अन्नामय वातावरण " बहुत अच्छा है , लोगो को समझ आने लगा है क़ी कुछ बदला भी जा सकता है | अच्छा सोच के अच्छा किया भी जा सकता है |
बहुत अच्छा लगा जब लोग ऑफिस से आकार अन्ना के जुलुस में शरीक हो रहे है , दौड़ रहे है देश के लिए , लोटे लगा रहे है , दुआ और प्राथना कर रहे है और कुछ नहीं तो कम से कम सही औए गलत देश के बारे में सोच रहे है |
आज मेरी हालत "रंग दे बसंती " फिल्म के उन किरदारों जैसी होने लगी है , जो भारत और यहाँ के लोगो को सोया हुआ सोचने क़ी गलती कर बैठे थे | मगर जब उन्होंने उनका जागना देखा तो वो कभी सो ना सके |
ये धरा वीरो से भरी पडी है | मगर मेरे प्रिय निबंधकार "श्री सरदार पूरण सिंह जी " के निबंध "सच्ची वीरता " क़ी एक लाइन मुझे इस वक़्त याद आती है क़ी "सच्चे वीर जल्दी नहीं जागते और जब जाग जाते है तब अपनी पलकों के इशारों से दुनिया के तख्तो ताज को पलट देते है "| सच है अन्दर का गुबार अब निकलने लगा है , सुनहरी बालिये अब खेतो में चमकने लगी है ,बीजो में से अंकुर फूटने लगे है |
कल क्या होगा ये तो पता नहीं मगर एक विश्वास जरूर है क़ी अच्छा होगा |
आपका
अनिल मिस्त्री

Tuesday, August 9, 2011

" सवालिया निशा "

"इक पल को सोचा करता हूँ भाग कर थकने के बाद

जाने क्यों हम तलाशते है जिंदगी , औरो के साथ

क्यों चाहिए हर पल कोई सरपरस्त साया सा

क्यों उठती है निगाहें गैरों क़ी ओर बनाकर इक सवालिया निशा

क्यों नहीं करते हम खुद अपने फैसले

क्यों देना हमें अपना , दूसरो को हिसाब

वक़्त से सब सीखा है हमने

गिरना भी उठना भी

तालीम भी ,तमीज भी और तजुर्बा भी

मगर क्यों नहीं होती आज भी

ये रूह हमारी आज़ाद

क्यों हम दरख्त नहीं बन पाते

होकर भी मजबूत हम बेल ही रह जाते

हम खू बहा जाते है

मरते और मार जाते है

कुछ भी सीख समझ के ,भी फैसले ना कर पाते

गुमराही या गुमनामी के नाम हो जाते कुर्बान

इक पल को सोचा करता हूँ भाग कर थकने के बाद "

Sunday, August 7, 2011

"कुत्ते "




"गुम हो गए थे हम जीने क़ी राह में

कुछ जताने कुछ साबित करने कुछ ऊंचा उठने क़ी चाह में

ना मिटटी रह गयी थी अपनी , ना रिश्ते ना वो निगाहें अपनी ताक में

बहुत लड़ के आय था मै वापस

बहुत कुछ छोड़ , एक मंजिल , एक रूतबा ,एक ऊंचा मकाम भी

उम्र भर तरस कर पाया था जो , वो अब बेमानी लगता

बस मेरी मिटटी क़ी महक के आगे हर गुल फीका पड़ता

याद आता वो सादा बचपन , वो हरियाली

वो साईकिल क़ी सवारी

वो छोटा सा स्कूल , और वो मेरा घर सरकारी

अब मगर ना घर था , ना बचपन ,ना कोई, सिवा पुरानी याद के

चाहत के आगे झूठे पिंजरे तोड़ आया

लिपट के अपनी मिट्टी के साथ में

मगर आ के यूँ लगा मिटटी मुझको भूल गयी

वक़्त क़ी आंधी में वो महक भी खो गयी

बहुत टूटा था मै उस दिन इस मिट्टी क़ी राह में

सब कुछ लुट चला और मिट गया था जैसे ख़ाक में

मगर उस पल इक अनजानी आवाज़ सी आई

कुत्ते! पहचानता भी नहीं अब

साले बड़ा आदमी हो गया तो भूल गया यार और रब

और बस उठा लिया उसने सीने से लगा के

यारा था वो मेरे बचपन का जो मुझको पहचान गया

और बदल गयी मेरी दुनिया जैसे उस आवाज से

इक पल को मै लुटा मुसाफिर था

और अब चलता मै इस कदर

मनो कोई सुलतान हो अपनी सल्तनत क़ी राह में

वो यार क़ी यारी मुझको मिल गयी

आज दुनिया अपनी इक पल में बदल गयी

हो जैसे एक आफताब नीले आसमान में "

Saturday, August 6, 2011

"बदला हुआ नाम "

मै भिलाई में ही जन्मा , यही पला बढ़ा मगर ,मै पिछले १४ वर्षो तक इस मिटटी से परिस्थती वश दूर रहा, मगर मैंने कभी इससे अपना नाता नहीं तोडा , कभी मित्रो के बहाने कभो प्रतियोगी परीक्षाओं के बहाने मैंने अपना सम्बन्ध इस मिटटी से बनाये रखा| छोटा मुह बड़ी बात मगर इस वनवास के दौरान मै जबलपुर , उदैपुर , जोधपुर , अजमेर ,नॉएडा .दिल्ली , गाज़ियाबाद , भोपाल और सागर जैसी जगहों पे रहा | हर जगह , हर पल हर समय मैंने इस मिटटी को याद किया इस धरा को निखारने के विषय में सोचा | सदैव मैंने राष्ट्रीय स्तर पर भी और अन्तर्रष्ट्रीय स्तर पर जो भी लोग मुझे मिले उन्हें मैंने बताया क़ी भिलाई और छत्तीसगढ़ क्या है | इस मीट्टी क़ी खासियत क्या है |
मगर जब भी मै गैर ज़रूरी विषयों पर लोगो को बहस करते देखता हूँ तो मुझे बड़ा दुःख होता है | इस लेख को लिखने का भी यही एक कारण है | जिसमे शहरों के नाम बदलने का विषय अत्यंत ही ज्वलंत और बेवजह का है |आजकल सुननाने में आ रहा है क़ी छत्तीसगढ़ क़ी राजधानी रायपुर का नाम बादल के रईपुर करने के बारे में बहस हो रही है | अगर हम अपने देश क़ी ही बात करे तो भले ही ये एक तरह का अपवाद हो मगर हमारे देश के भी ५ नाम क्यों बेवजह रखे गए है | अंग्रेजो के लिए इंडिया,उर्दू भाषियों के लिए

हिन्दुस्तान और हिन्दुओ के लिए भारत , कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के लिए भारत वर्ष , और पुराने लोगो के लिए आर्यवर्त आखिर क्यों ? हम यु ही खुद को श्रेणियों में क्यों रखते है ?

क्या अमेरिका या फ़्रांस का कोई और नाम है ? क्या जर्मनी का कोई और नाम है ? हमारी संस्कृति यु ही बहुत फली फूली है सदैव ही , मगर समय के साथ विकास और सुधार क़ी जरूरत हर जगह है , हमारे छत्तीसगढ़ में भी | मगर हम बगैर उस ओर ध्यान दिए नाम बदलने क़ी फालतू बहस को शुरू करने जा रहे है |मुझे हँसी अती है जब पढ़े लिखे लोग ऐसी बेकार क़ी बातो पे अपना समय बर्बाद करते है | नाम बदलने से कोन सा भला हो जायेगा या विकास और सुधार का कौन सा नया क्रम शुरू हो जायेगा ? मुझे तब भी बुरा लगा था जब बम्बई का नाम मुंबई रखा गया , मद्रास को चेन्नई रखा गया . कलकत्ता कोलकाता हो गया , ये सिर्फ एक बेवजह के क्षेत्रवाद के अलावा कुछ नहीं है | जिसका फायदा उठा कर समय समय पर राजनैतिक लाभ उठाये जाते रहे है | ऊपर से शहरो के नाम बदलने से हर बोर्ड , हर विभाग के हर पेपर , कागजात, होर्डिंग , हर बिल्डिंग का नाम बदलने पर व्यर्थ ही धन और समय खराब होता होगा कभी इस बात का अंदाजा लगाया जाना चाहिए |

वैसे भी बरसो से जो नाम हम सुनते आ रहे है उसमे कोई फर्क होगा तो जरूर कुछ अटपटा ही लगेगा और जब हम उसके आदी हो जायेंगे तब फिर कोई नया नाम आ जायेगा | हम तो यु ही मायावती क़ी पार्क बनाने क़ी खर्चीली योजनाओं,कॉमन वेल्थ गेम्स के गैर जरूरी खर्चों , और पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामो और महंगाई क़ी मार झेल ही रहे है | क्या हम उसके लिए कुछ कर सकते है | भिलाई में अगर स्टील प्लांट में नौकरी नहीं लगी रेलवे में नौकरी नहीं लगी तो हमें सीधे ये मिटटी छोड़ के जाना पड़ेगा क्योंकि यहाँ कोई और सम्भावनाये नहीं है है | हमें इन सम्भावनाओ को बढ़ाने के बारे में विचार करना चाहिए , ना क़ी नाम बदलने के बेवजह खर्च बढ़ाऊ मुद्दे पर |
शायद बहुत से लोग छत्तीसगढ़ को भी महाराष्ट्र या तमिलनाडु जैसा क्षेत्रवादी प्रदेश बना देना चाहते है , और आज हमारा प्रदेश कुछ हद तक उस राह पर चल भी चुका है | बस्तर और दंतेवाडा तो आधे जम्मू या काश्मीर बन भी चुके है क्यों ? ये बहस का विषय है , शायद राजनितिक वजह से या गुमराही क़ी वजह से,या भावनाओं को भड़काने क़ी वजह से |हम हमेशा से भिलाई को लिट्टिल इंडिया और छत्तिसगढ़ को सर्व धर्म सम्प्रदाय का विकसित, सरल छवी वाला प्रदेश कहते और सुनते आये है , इसकी सवच्छ छवी को दंतेवाडा और नक्सलवाद गन्दा करता जा रहा है ऊपर से नाम बदलने क़ी बहस भी अगर छिड़ गयी, तो शायद ये उस आग को और हवा दे | समझ नहीं आता क़ी हम पहले भारत के नागरिक है या प्रदेश के ?