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Thursday, November 10, 2011

उलझी सी कश-म-कश

उलझी सी कश-म-कश

ज़िन्दगी एक खूबसूरत उलझी सी कश-म-कश
बहती जैसे एक पहाडी नदी अल्हड मद-मस्त
कभी जूझती कभी गाती
कभी पथरीली चट्टानों से चोटिल भी हो जाती
मगर बहती जाती हर पल
ना रुकना , ना थकना और ना थमना
बस आगे ही बढ़ते रहना
जैसे चलने का फलसफा हो सीधा सा एक बस
कभी मकडी के एक जाले पे
जमी ओस की बूंदों की लडियां
कभी किसी जंगली कचनार की
फूटती कलियाँ
कभी सुर्ख रंग जंग का
तो कभी बहते आंसू बेबस
कभी क्रोध, क्षोभ ,बदले और मोह की अनगिनत लपटों में जलती
कभी दूर ऊंचे मंदिर के दीपक में टिमटिमाती
कभी मस्जिद क़ी अजान में गुनगुनाती
कभी मिलती ऐसे, हो मानो अज्ञान का गहरा तमस
और कभी प्रेयसी के अधरों का सौम्य स्पर्श
ज़िन्दगी एक उलझी सी कश-म-कश
बहती जैसे एक पहाडी नदी अल्हड मद-मस्त

Saturday, November 5, 2011

हमारा शहर

पिछले कुछ दिनों से हम छत्तीसगढ़ का राज्य दिवस मना रहे है , प्रगति पथ पर अग्रसर हमारा प्रदेश और जनजीवन देख कर मन प्रसन्न तो होना चाहता है मगर वो मुस्कान पूरी तरह कपोलो पे आ नहीं पाती . मुझे अब भी याद है आज से ११ वर्ष पहले जब १ नोव्म्बेर २००० को छत्तीसगढ़ राज्य बना था मै यही था अपनी सर्वप्रिय नगरी भिलाई में .भिलाई मेरा सपना था और मुझे अतिप्रिय. जब नया राज्य बना तो सभी ने कई तरह के सपने देखे . किसी ने चाह क़ी अब भिलाई में सॉफ्टवेर पार्क बनेगा , और नयी कंपनिया आयेगी , सारी सड़के ४ लेन क़ी हो जाएगी , रायपुर राजधानी बन्ने के कारण उसके पास होने का सबसे अधिक लाभ भिलाई को मिलेगा . वैसे भी भिलाई खुद ही दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखता आया है और अगर मै ये कहू क़ी अगर छत्तीसगढ़ नया राज्य ना भी बनता तो भी लोग भिलाई को ज़रूर जानते . इसकी वजह है यहाँ क़ी प्रगतिशील मानसिकता , भिलाई इस्पात सयंत्र , बहुत ही अच्छा शिक्षा का, खेलकूद का, सांस्कृतिक कलाओ का , हरा भरा वातावरण और इस छोटी सी जगह से यहाँ के लोगो का प्रेम और एक गर्मजोशी भरा व्यवहार . अगर कोई भिलाई वासी कही दूर जाता है तो उसमे बंगाल,बिहार,पंजाब ,हरियाणा,राजस्थान, दक्षिण भारत हर जगह क़ी झलक होती है . बाहरी व्यक्ति समझ ही नही पता क़ी आखिर ये आदमी है कहाँ का ?
और फिर जब वो भिलाई कहता है तब लोग ये जानने को उत्सुक हो जाते है क़ी ये जगह कैसी है ?
शायद यही कारण है क़ी आज क़ी तारीख में जर्मनी , अमेरका ,यूरोप और सारी दुनिया के लोग इस जगह के बारे में जानते है , कई वर्षो से भिलाई सर्वाधिक IIT चयनित उम्मीदवारों का , रेलवे, कर्मचारी चयन आयोग और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओ में शीर्ष स्तर पे रहा है | पिछले १४ वर्षो में मै खुद जहा भी रहा , मैंने रेलवे में ,corporate जगत में अरब ,अमेरिकन,फ़्रांसिसी,जेर्मन और ना जाने कितने देशो के लोगो से मिला , और जब भी अवसर मिला उन्हें ये बताया क़ी छत्तीसगढ़ और भिलाई क्या है | उस वर्णन में मेरी आँखों क़ी चमक देख कर वो ये जरूर कह उठते थे क़ी "once I want to see your native place Bhilai".और यही मेरा सबसे बड़ा उपहार होता था |
मेरा यहाँ वापस आना मेरी तकदीर से मेरी लम्बी लड़ाई का अंत था , जिसमे मै विजयी रहा था | ये भावना मुझे शायद मेरी सबसे बड़ी जीत लगती है | यहाँ की धूप, ठण्ड, हरियाली , स्कूल जाते बच्चे और काम पे जाते लोग और बारिश में भीगी सड़के देखता हूँ तो मन प्रसन्न हो उठता है | मन कहता है बस अब हमेशा को यही रहना है कभी कही नहीं जाना | क्योंकि मै हाथ बड़ा कर अपना बचपन छू सकता हूँ , स्कूल का वो बच्चा बन सकता हूँ जो पहली बार कलम पकड़ता है, पहली बार साइकल चलता है , जी भर कर दौड़ता है ,तितलीया पकड़ता है, पहली बार अपनी दाढी मूछ बनता है , पहली बार किसी से प्यार करता है और ना जाने कैसी और कितनी अनगिनत बाते जो यहाँ उसकी रची बसी है जो उसे कभी कही नहीं जाने देती |

मै अपनी यादो क़ी तरह इस शहर को संजो के रखना चाहता हूँ , मगर जब मै टूटी सड़के देखता हूँ , जगह जगह गढढे, गन्दगी , कचरा , बेतरतीब दुकाने , गन्दा पानी , सडको पे फिरते आवारा जानवर और अव्यवस्था देखता हूँ लगता है मेरा सपना टूट रहा है | मेरा बस चले तो इस शहर में धूल और गंदगी का नमो निशाँ ना हो , एक भरा गिलास ले कर भी अगर हम चले तो क्या मजाल क़ी वो सड़क पे छलक जाए , चारो ओर हरियाली हो कुछ बनता हो , उन्नती करता हो , सवरता हो|,दुर्ग भिलाई रायपुर को मेट्रो से जोड़ दिया जाये , सूचना प्रोद्योगिकी से लेकर हर क्षेत्र क़ी उन्नती हो ,और इस क्षेत्र का हर इंसान और भी ज्यादा फक्र से बता सके क़ी वो यहाँ का है | मुझे पता है कुछ लोग मेरे ये विचार जानकर कहेंगे स्वप्न देखना आसान है मगर करना बहुत कठिन | मगर मेरा कहना यही है सोचने से ही सब होता है ,चाहने से ही रहे बनती है | मैंने किसी ट्रक के पीछे पढ़ा था
"सोच बदलो सितारे बदलेंगे
नजर बदलो नज़ारे बदलेंगे
कश्ती वही रहने दो
दिशा बदलो किनारे बदलेंगे "
कभी राजनीती के चलते कभी अव्यवस्था के चलते कभी कुप्रबंधन के चलते | वजह जो भी रही हो मगर इन सारी समस्याओ के पीछे हमारी कुछ बुरी आदते भी जिम्मेदार है | मै रोज अखबार में ना जाने ऐसे कितने जन समूह , संगठन और लोगो क़ी भीड़ देखता हूँ जो बिना किसी उद्देश्य के साथ मिलकर काम करते है , कभी रंगोली डालने , कभी मिठाई बनाने , कभी सस्ती लोकप्रियता पाने और ना जाने क्या क्या | मै ये नहीं कहता क़ी वो सब फालतू लोगो का संगठन है | मुझे लगता है क़ी इस सब से भी समय निकाल कर क्या कभी ये जनसमूह कोई शहरी जागरूकता वाला कार्यक्रम करते है ? अपने शहर को कैसे और अच्छा बनाना चाहिए , लोगो को किन बातो क़ी जानकारी होनी चाहिए , किस क्षेत्र में पुलिस क़ी गश्त होनी चाहिए, कहा सार्वजनिक शोचालय होना चाहिए , कहा ज्यादा सार्वजनिक वाहन चलने चाहिए | ऐसे अनेको विषय है जिन पे बात होनी चाहिए | क्योंकि जब बाते होंगी तो विचार बनगे और जब विचार एक जनसमूह में बनेगा तो वो परिवर्तन का कारण बनेगा , वरना जो जैसा है वो वैसा ही चलता रहेगा |
शायद हमारे पास कोई जरिया ना हो सुधारने का ,मगर हम आदते तो सुधार सकते है | क्या जरूरी है क़ी हम अपने जानवर खुली सड़क पे ही छोड़े. कचरा और गंदगी का निपटारा ना कर सके , अपने घर के सामने अगर सड़क पे गढ्ढा बन गया है तो हम उसे बर्दाश्त कर ले और उसके और बड़ा होने का इन्तजार करे और जब कोई उसमे गिर के मरे तब वो गढ्ढा भरेगा | चारो और उडती धुल ,धुआ और गन्दगी हम कैसे बर्दाश्त कर लेते है ? मै तो कहता हूँ सरकारे गिर जानी चाहिए अगर हमारे जनप्रतिनिधि हमें एक साफ़, सुंदर प्रगतिशील और सुरक्षित शहर ना दे सके तो | और हमारा प्रदेश और नगर तो वैसे ही बहुत सुंदर और प्रगतिशील है , मगर ये विडंबना है क़ी हम उसकी सुन्दरता को बढ़ाने के बजाय कम करते जाते है | इस खूबसूरत कालीन क़ी खूबसूरती हमने खूब देखी , मगर अब हमें ये ध्यान देना चाहिए क़ी इस पर टाट का कोई पैबंद ना लगने पाए | फक्र करने के दिन तो बहुत आयेंगे , मगर इस शहर को और इस प्रदेश को सवारने में उमर गुजर जाए | ताकी हमारी आने वाली पीढी भी इससे उतना ही प्रेम करे जितना हम करते है |

आपका
अनिल मिस्त्री

Tuesday, October 18, 2011

"रावण छोटा था "

रावण छोटा था

इस बार हम हमेशा क़ी तरह दशहरे का मेला देखने गए | और बार क़ी तरह इस बार रावण देखने में कई भिन्नताए थी , मेरे लिए इस बार का अवसर और भी ख़ास इसलिए थे क्योंकि मै १५ वर्षो के बाद भिलाई का रावण देख रहा था | मन में अनेको उमंगें थी , उत्साह था, उमर के इस मोड़ पे बचपन बहुत दूर जा चुका था मगर अपनी इस जमी पे आज भी आँखों के आगे दिखाई दे जाता| इन दिनों बचपन में सुबह से ही हमारा उत्साह देखते ही बनता था , शाम होते होते दिल क़ी धड़कने उत्साह से बढ जाती थी , शाम को जल्दी ही हम सब दोस्त खेल कर निपट जाते और ६ बजने तक तैयार होकर पिताजी का इन्तजार करने lagte | बचपन में अपने पिता के साथ सिविक सेण्टर का रावण का मेला, लम्बी चलने वाले आतिशबाजी और विशाल जनसमूह | हम दोनों भाई बहन पिताजी क़ी दुपहिया की सीट पे खड़े हो कर घंटो तक चलने वाले इस कार्यक्रम को देखा करते | अंत में जब रावण का पुतला जलता तो बड़ा आनंद आता , खासतौर पर मुझे रावण का सर पटाखे से फूटते देखने में अति आनंद आता था | अब ना पिताजी रहे और ना वो बचपन , हा मगर आज उस बचपन क़ी कड़ी जो पिछले १५ सालो से टूट गयी थी आज फिर जुड़ गयी , मुझे इस बात क़ी बड़ी खुशी थी और मै आज भी अपने उस खोये बचपन के साथ उस आतिशबाजी को किसी और जगह पे निहार रहा था |

मगर सच कहू तो इस रावण को देख के लगा ही नहीं क़ी इसमें रावण वाले वो बात है | झुकी हुई तलवार , पिचका हुआ पेट , ऊँचाई भी बहुत कम | बस टाई क़ी कमी थी वरना ये रावण किसी साक्षात्कार देने वाले प्रतियोगी की तरह ही लगता | राक्षसों वाला आवेश और रौब इस रावण में लगा ही नहीं | बड़ा विचार विमर्श किया , लोगो ने भी बड़ा मजाक उड़ाया , आतिशबाजी क़ी तारीफ तो की मगर सबने कहा "साली महंगाई ने रावण को भी नहीं छोड़ा " सचमुच सरकारी उलट पुलट और वर्तमान के नेताओ क़ी काली करतूतों को देख रावण भी लज्जित हो उठा | भ्रष्टाचार को ख़तम करने जानता ने मुहीम चलायी तो सरका ने महंगाई और बढ़ा दी | ईंट धोने वाले रामू और पानी भरने वाली कमली से लेकर स्कूल जाने वाले विनय और कॉलेज जाने वाले बच्चो तो काम काजी लोगो सभी को साथ में लपेट लिया | धंधे वालो ने भी अपना नुक्सान ना करने क़ी खातिर मिलावट करनी शुरू कर दी | पहले ४० % भ्रष्टाचारी स्वेच्छा से थे अब बचे ६०% मजबूरी में बन जायेंगे | जो बोले उसका गला काट क़ी नीती ने रावण का सारा व्यक्तित्व उनमे भर दिया | अब जब क़ी इतना सब हो ही चुका था , सिवाय सहने के और कुछ दबने के इस वक़्त क्या कर सकते थे | एक परम्परा थी बुराई पे अच्छाई क़ी विजय क़ी , जो हम मना रहे थे | मगर बुराई के ही प्रतीक चिन्ह जैसे लोग रावण को मात देते हुए जला रहे थे | आज रावण से भी ऊंचा कद उनका हो चला था , जो जन प्रतिनिधि कहलाते है | सारा तमाशा देखकर हम भी चल पड़े , मगर जब लोगो ने पुछा क्यों जी मजा आया ? सो हम क्या कहते सिवाय इसके क़ी हां ... मजा तो आया मगर "रावण छोटा था "

Sunday, August 21, 2011

"सच्चे वीर "

मेरी एक माइक्रो पोस्ट चलते चलते :


वक़्त क़ी कमी क़ी वजह से लिखना बहुत कुछ कम हो गया है , मगर कभी बंद नहीं होगा , क्योंकि साँस तो चलती ही रहती है |
और मेरी कलम साँस के साथ ही बंद होगी | लिखने को तो बहुत कुछ है मगर पेट के आगे दिल अकसर इस दुनिया में छोटा पड़ जाता है|
और पेट क़ी जरुरत ज्यादा बड़ी हो जाती है |
मै हमेशा से अपने लेखो में देश क़ी वर्तमान हालत का , और लोगो क़ी अनभिज्ञता का जिक्र करता आया हूँ|
कभी अपना गुसा , कभी असंतोष कभी नाकामी, कभी एक बदलाव क़ी चाहत और कभी शायद अपनी कलम से कोई शुरुआत करने क़ी ख्वाईश करता आया हूँ | मगर आज "अन्ना हजारे " के बिगुल बजाने के बाद जो लहर उठी है उससे मुझे बड़ी खुशी होती है | कुछ लोगो को मैंने ये कहते भी सूना है क़ी अगर अन्ना क़ी लोकप्रियता का यही आलम रहा तो उनका लोकपाल बिल तो पास हो जायेगा , मगर शायद भारत में कमुनिस्म आ जाएगा और उन्मुक्त व्यवसाय और स्वतंत्र प्रतियोगिता का माहोल ख़तम हो जायेगा | जो क़ी भारत देश क़ी उन्नती का एक बड़ा कारण है |
कुछ लोग ये भी कहते है क़ी शायद वर्तमान प्रधान मंत्री को इस्तीफ़ा दिला कर राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बना दिया जायेगा और ये कांग्रेस क़ी एक बहुत बड़ी चाल है | कुछ कहते है क़ी ये भाजपा क़ी चाल है |
वजह चाहे जो भी रही हो मगर मै अगर अपनी बात करू तो , मेरे अन्दर जो एक असंतोष छट-पटाता था और लोगो क़ी देशभक्ती क़ी भावना को थोडा सा भूल जाने का वहम मेरे मन में था वो काफी हद तक दूर हो गया | क्योंकी हर गली हर मोहल्ले में हर जगह फिर से तिरंगे क़ी लहर दौड़ गयी है और इस वजह से इस बार का सवतंत्रता दिवस पहले से कही बेहतर लगा |
ये "अन्नामय वातावरण " बहुत अच्छा है , लोगो को समझ आने लगा है क़ी कुछ बदला भी जा सकता है | अच्छा सोच के अच्छा किया भी जा सकता है |
बहुत अच्छा लगा जब लोग ऑफिस से आकार अन्ना के जुलुस में शरीक हो रहे है , दौड़ रहे है देश के लिए , लोटे लगा रहे है , दुआ और प्राथना कर रहे है और कुछ नहीं तो कम से कम सही औए गलत देश के बारे में सोच रहे है |
आज मेरी हालत "रंग दे बसंती " फिल्म के उन किरदारों जैसी होने लगी है , जो भारत और यहाँ के लोगो को सोया हुआ सोचने क़ी गलती कर बैठे थे | मगर जब उन्होंने उनका जागना देखा तो वो कभी सो ना सके |
ये धरा वीरो से भरी पडी है | मगर मेरे प्रिय निबंधकार "श्री सरदार पूरण सिंह जी " के निबंध "सच्ची वीरता " क़ी एक लाइन मुझे इस वक़्त याद आती है क़ी "सच्चे वीर जल्दी नहीं जागते और जब जाग जाते है तब अपनी पलकों के इशारों से दुनिया के तख्तो ताज को पलट देते है "| सच है अन्दर का गुबार अब निकलने लगा है , सुनहरी बालिये अब खेतो में चमकने लगी है ,बीजो में से अंकुर फूटने लगे है |
कल क्या होगा ये तो पता नहीं मगर एक विश्वास जरूर है क़ी अच्छा होगा |
आपका
अनिल मिस्त्री

Tuesday, August 9, 2011

" सवालिया निशा "

"इक पल को सोचा करता हूँ भाग कर थकने के बाद

जाने क्यों हम तलाशते है जिंदगी , औरो के साथ

क्यों चाहिए हर पल कोई सरपरस्त साया सा

क्यों उठती है निगाहें गैरों क़ी ओर बनाकर इक सवालिया निशा

क्यों नहीं करते हम खुद अपने फैसले

क्यों देना हमें अपना , दूसरो को हिसाब

वक़्त से सब सीखा है हमने

गिरना भी उठना भी

तालीम भी ,तमीज भी और तजुर्बा भी

मगर क्यों नहीं होती आज भी

ये रूह हमारी आज़ाद

क्यों हम दरख्त नहीं बन पाते

होकर भी मजबूत हम बेल ही रह जाते

हम खू बहा जाते है

मरते और मार जाते है

कुछ भी सीख समझ के ,भी फैसले ना कर पाते

गुमराही या गुमनामी के नाम हो जाते कुर्बान

इक पल को सोचा करता हूँ भाग कर थकने के बाद "

Sunday, August 7, 2011

"कुत्ते "




"गुम हो गए थे हम जीने क़ी राह में

कुछ जताने कुछ साबित करने कुछ ऊंचा उठने क़ी चाह में

ना मिटटी रह गयी थी अपनी , ना रिश्ते ना वो निगाहें अपनी ताक में

बहुत लड़ के आय था मै वापस

बहुत कुछ छोड़ , एक मंजिल , एक रूतबा ,एक ऊंचा मकाम भी

उम्र भर तरस कर पाया था जो , वो अब बेमानी लगता

बस मेरी मिटटी क़ी महक के आगे हर गुल फीका पड़ता

याद आता वो सादा बचपन , वो हरियाली

वो साईकिल क़ी सवारी

वो छोटा सा स्कूल , और वो मेरा घर सरकारी

अब मगर ना घर था , ना बचपन ,ना कोई, सिवा पुरानी याद के

चाहत के आगे झूठे पिंजरे तोड़ आया

लिपट के अपनी मिट्टी के साथ में

मगर आ के यूँ लगा मिटटी मुझको भूल गयी

वक़्त क़ी आंधी में वो महक भी खो गयी

बहुत टूटा था मै उस दिन इस मिट्टी क़ी राह में

सब कुछ लुट चला और मिट गया था जैसे ख़ाक में

मगर उस पल इक अनजानी आवाज़ सी आई

कुत्ते! पहचानता भी नहीं अब

साले बड़ा आदमी हो गया तो भूल गया यार और रब

और बस उठा लिया उसने सीने से लगा के

यारा था वो मेरे बचपन का जो मुझको पहचान गया

और बदल गयी मेरी दुनिया जैसे उस आवाज से

इक पल को मै लुटा मुसाफिर था

और अब चलता मै इस कदर

मनो कोई सुलतान हो अपनी सल्तनत क़ी राह में

वो यार क़ी यारी मुझको मिल गयी

आज दुनिया अपनी इक पल में बदल गयी

हो जैसे एक आफताब नीले आसमान में "

Saturday, August 6, 2011

"बदला हुआ नाम "

मै भिलाई में ही जन्मा , यही पला बढ़ा मगर ,मै पिछले १४ वर्षो तक इस मिटटी से परिस्थती वश दूर रहा, मगर मैंने कभी इससे अपना नाता नहीं तोडा , कभी मित्रो के बहाने कभो प्रतियोगी परीक्षाओं के बहाने मैंने अपना सम्बन्ध इस मिटटी से बनाये रखा| छोटा मुह बड़ी बात मगर इस वनवास के दौरान मै जबलपुर , उदैपुर , जोधपुर , अजमेर ,नॉएडा .दिल्ली , गाज़ियाबाद , भोपाल और सागर जैसी जगहों पे रहा | हर जगह , हर पल हर समय मैंने इस मिटटी को याद किया इस धरा को निखारने के विषय में सोचा | सदैव मैंने राष्ट्रीय स्तर पर भी और अन्तर्रष्ट्रीय स्तर पर जो भी लोग मुझे मिले उन्हें मैंने बताया क़ी भिलाई और छत्तीसगढ़ क्या है | इस मीट्टी क़ी खासियत क्या है |
मगर जब भी मै गैर ज़रूरी विषयों पर लोगो को बहस करते देखता हूँ तो मुझे बड़ा दुःख होता है | इस लेख को लिखने का भी यही एक कारण है | जिसमे शहरों के नाम बदलने का विषय अत्यंत ही ज्वलंत और बेवजह का है |आजकल सुननाने में आ रहा है क़ी छत्तीसगढ़ क़ी राजधानी रायपुर का नाम बादल के रईपुर करने के बारे में बहस हो रही है | अगर हम अपने देश क़ी ही बात करे तो भले ही ये एक तरह का अपवाद हो मगर हमारे देश के भी ५ नाम क्यों बेवजह रखे गए है | अंग्रेजो के लिए इंडिया,उर्दू भाषियों के लिए

हिन्दुस्तान और हिन्दुओ के लिए भारत , कुछ ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के लिए भारत वर्ष , और पुराने लोगो के लिए आर्यवर्त आखिर क्यों ? हम यु ही खुद को श्रेणियों में क्यों रखते है ?

क्या अमेरिका या फ़्रांस का कोई और नाम है ? क्या जर्मनी का कोई और नाम है ? हमारी संस्कृति यु ही बहुत फली फूली है सदैव ही , मगर समय के साथ विकास और सुधार क़ी जरूरत हर जगह है , हमारे छत्तीसगढ़ में भी | मगर हम बगैर उस ओर ध्यान दिए नाम बदलने क़ी फालतू बहस को शुरू करने जा रहे है |मुझे हँसी अती है जब पढ़े लिखे लोग ऐसी बेकार क़ी बातो पे अपना समय बर्बाद करते है | नाम बदलने से कोन सा भला हो जायेगा या विकास और सुधार का कौन सा नया क्रम शुरू हो जायेगा ? मुझे तब भी बुरा लगा था जब बम्बई का नाम मुंबई रखा गया , मद्रास को चेन्नई रखा गया . कलकत्ता कोलकाता हो गया , ये सिर्फ एक बेवजह के क्षेत्रवाद के अलावा कुछ नहीं है | जिसका फायदा उठा कर समय समय पर राजनैतिक लाभ उठाये जाते रहे है | ऊपर से शहरो के नाम बदलने से हर बोर्ड , हर विभाग के हर पेपर , कागजात, होर्डिंग , हर बिल्डिंग का नाम बदलने पर व्यर्थ ही धन और समय खराब होता होगा कभी इस बात का अंदाजा लगाया जाना चाहिए |

वैसे भी बरसो से जो नाम हम सुनते आ रहे है उसमे कोई फर्क होगा तो जरूर कुछ अटपटा ही लगेगा और जब हम उसके आदी हो जायेंगे तब फिर कोई नया नाम आ जायेगा | हम तो यु ही मायावती क़ी पार्क बनाने क़ी खर्चीली योजनाओं,कॉमन वेल्थ गेम्स के गैर जरूरी खर्चों , और पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामो और महंगाई क़ी मार झेल ही रहे है | क्या हम उसके लिए कुछ कर सकते है | भिलाई में अगर स्टील प्लांट में नौकरी नहीं लगी रेलवे में नौकरी नहीं लगी तो हमें सीधे ये मिटटी छोड़ के जाना पड़ेगा क्योंकि यहाँ कोई और सम्भावनाये नहीं है है | हमें इन सम्भावनाओ को बढ़ाने के बारे में विचार करना चाहिए , ना क़ी नाम बदलने के बेवजह खर्च बढ़ाऊ मुद्दे पर |
शायद बहुत से लोग छत्तीसगढ़ को भी महाराष्ट्र या तमिलनाडु जैसा क्षेत्रवादी प्रदेश बना देना चाहते है , और आज हमारा प्रदेश कुछ हद तक उस राह पर चल भी चुका है | बस्तर और दंतेवाडा तो आधे जम्मू या काश्मीर बन भी चुके है क्यों ? ये बहस का विषय है , शायद राजनितिक वजह से या गुमराही क़ी वजह से,या भावनाओं को भड़काने क़ी वजह से |हम हमेशा से भिलाई को लिट्टिल इंडिया और छत्तिसगढ़ को सर्व धर्म सम्प्रदाय का विकसित, सरल छवी वाला प्रदेश कहते और सुनते आये है , इसकी सवच्छ छवी को दंतेवाडा और नक्सलवाद गन्दा करता जा रहा है ऊपर से नाम बदलने क़ी बहस भी अगर छिड़ गयी, तो शायद ये उस आग को और हवा दे | समझ नहीं आता क़ी हम पहले भारत के नागरिक है या प्रदेश के ?

Sunday, June 19, 2011

"पुरानी सोच का आदमी "


"पुरानी सोच का आदमी "

मै अपनी ज़िन्द्गि मे बहुत सी जगहो पे रहा और ज़िन्द्गि को उसके उतार चदाव् को देखता रहा। मेरी ज़िन्द्गि पे मेरे मिडिल स्कूल का और टीचरो का बहुत ज्यादा प्र्भाव् पडा ।
सच कहु तो मैने अपनी आन्खो के आगे ज़माने को बदलते देखा है । मगर हर वक़्त मे , हर ज़माने मे साहित्य का समाज पे बहुत गहरा प्रभाव् देखा गया है । मगर जब् मै आज के हालात देखता हू तो बड़ा अजीब् सा लगता है । लगता है चारो ओर आग लगी हुइ है । और नयी पीढी ना जाने किस नशे मे डूबी हुइ है ? बचपन के पौधो मे हम व्यवसयिकता और पक्के प्रोफ़ेसिओनलिसम् का ऐसा पानी और ऐसी खाद दाल रहे है की , ना तो नयी पीढी की जादातर फ़सल् कुछः जान पा रही है और ना ही जानने की कोशिश कर रही है । "बस पैसा होना चाहिये , मस्ती होनी चाहिये और क्या चाहिये ज़िन्द्गि मे " ऐसे जुम्ले अक्सर सुनने को मिल जाते हैं ।
किताबो के नाम पर और साहित्य के नाम पे करिएर् और सामान्य ज्ञान तो सही है मगर हमारे अपने इतिहास , साहित्य ,देशप्रेम ,समाज और संस्कृति की तरफ़् जुडा साहित्य कम होता जा रहा है ।
आजकल लोग इन सब् बातो को पुराना और ये सब् बाते करने वालो को पुरानी सोच का आदमी कहते है । एक घरेलू मासिक पत्रिका में एक लेख लिखा था क़ी कैसे कुवारापन सुर्जरी से फिर से पाया जा सकता है .
अगर कोई लड़की बहुत ऊँचे पद पे है तो उसका कौमार्य भंग है या नहीं इससे उसके होने वाले पति को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए . और वो पत्रिका सबसे ज्यादा बिकने वाली घरेलू पत्रिका है | ऐसा पानी पी के कैसी फसल पैदा होगी ये अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है .

आजकल अन्ग्रेजी सबको पता है , अङ्ग्रेजी साहित्य , अश्लील साहित्य , टिप्स अमीर बनने के ,सुन्दर बनने के , प्दार्थ्वादी सोच पैदा करने के और धन को इन्सनियत से अधिक मह्त्व देने के सारे साहित्य और किताबे बाज़ार् मे मोउजूद हैं , मगर हिन्दी की किताबो का हमारे साहित्य और संस्कृति का ज्ञान कराने वाली किताबे और लोग गायब् होते जा रहे है । क्या करे बाज़र् मे भी वो ही आता है जिसकी maang होती है ।
मुज्हे बडा आश्चर्य होता है जब् मै सुनता हू की एक इन्जिनिअर को ये नही पता की हमारे देश का राष्ट्र पति कौन् है , या एक कंपनी सचिव को ये नही पता की भारत मे कितने राज्य है । कुछः दिनो पहले मै एक प्रतिष्ठित कंपनी मे था , मेरे साथ् एक लडकी कैब् मे जाया करती थी , वो हर बात के बाद ये जरूर कहती थी "after all I am M.B.A." और मुज्हे बडी हन्सी आती थी जब् हम उसे कोइ हिन्दी की गिनती कहते तो वो उसका मत्लब् पूछ्ती थी । उसे ये नही पता था की बावन् और चौआलीस् के मायने क्या है , मगर वो अपने आपको दुनिया का सबसे ज्यादा पढा लिखा और व्यवसायिक इन्सान सोच्ती थी । जब् मै उसे तमूर और शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप के किस्से सुनाता तो वो यु देखती मानो मै किसी और देश से आया हू ।
उसे भारत के ५ नाम नही पता है मगर अमेरिका के बारे मे सब् कुछः पता है । किस दुकान मे कपडे की किस ब्राण्ड् पे कितना discount है सब् पता है । मगर ना तो मुन्शी प्रेम चन्द को वो ठीक से बता पाती है और ना ही उसे ये पता है की भारत मे कितने राज्य और कितने केन्द्र शाषित प्रदेश है । इन सब् बातो को वो मिडिल स्कूल् के किसी किताब् के पन्ने से ज्यादा वो कुछः नही सम्ज्ती , जिसे याद रखने से कोइ फ़ाय्दा नही होने वाला
खैर ऐसे लोगो की कमी नही है , आज का हमारा माहोउल् ही ऐसा होता जा रहा है । पढो वो जिससे सिर्फ़ नोकरी मिल जाये , प्रमोशन हो जाये , पैसा मिल जाये , exam मे पास हो जाये बस , बाकी किसे जरुरत है ?
क्या करना की बाबर ने क्या किया , हुमायु ने क्या बनाया, शङ्कराचार्य जी कौन् थे ? हमारे देश मे कितने राज्य है ? हिन्दी वास्तव् मे क्या है ? हमारे पास कौन् कौन् से लडाकू विमान है , हमारी सेना की ताक़त् क्या है , इस सब् से क्या फ़ाय्दा ? मै ऐसे बहुत से लोगो से मिला हू जो मेरा हिंदी उच्चारण और ये सब बाते जो मैंने ऊपर कही, सुनकर मुझे हिंदी का विशेषज्ञ या स्कूल टीचर या फिर व्यक्तिगत रूप से इन बातो में रूचि रखने वाला समझते है . जबकि सच बात तो ये है क़ी ये सब बहुत ही मामूली बाते है जो किसी देश में रहने वाले हर आदमी को जानना चाहिए. अपनी भाषा का सम्मान करना चाहिए और दूसरो से पहले अपने बारे जानकारी रखना चाहिए .
आजकल कॉन्वेंट स्कूलों में और महंगे प्रतिष्ठित संसथानो में भी सिर्फ व्यवसायिक ज्ञान ही दिया जाता है और उसका नतीजा ये निकलता है इंसान कॉरपोरेट जगत का पैसा कमाने वाला पुतला बन के रह जाता है .
ये सच है क़ी धन आज के वक़्त में बहत जरूरी है , उन्नती करना भी बहुत अच्छा है , मगर अपनी जड़ो को भूलना बिलकुल भी अच्छा नहीं है .हलाकि ये अपने अपने लगाव और रूचि क़ी बात है , मगर मुझे तो भारत के इतहास और संस्कृति से ज्यादा भरा पूरा और समृद्ध किसी और देश का नहीं लगता . हर त्यौहार , हर पर्व , हर फसल और पौधे से लेकर आजादी के आन्दोलनों और देश प्रेम के सच्चे किस्सों से ये देश भरा पड़ा है .
जहा हर २० किलोमीटर के बाद बोली बादल जाती है , संस्क्र्तियाँ बदल जाती है, खाने पीने व्यंजनों से लेकर कपडे तक बदल जाते है , जहा बर्फ से लेकर रेगिस्तान , समन्दर से लेकर पर्वतीय देव्भूमियां मौजूद है. क्या यु भी ये पढने का और खुद पे गर्व करने का विषय नहीं है ? क्या ये जरूरी है क़ी कल को कोई दूसरे देश का नागरिक आये और यहाँ रिसर्च करके एक किताब लिखे , और जब वो महंगे उच्चवर्गीय माल या दुकानों में जाए तब हम उसे खरीद के और पढ़ के अपने बारे में जाने ? बिलकुल नहीं , मै भी एक शुद्ध कॉरपोरेट जगत में काम करता हूँ , जहा सोच को भी व्यवसायिक होना पड़ता है , मगर सिर्फ वही तक , घर आकर में पूरा हिन्दुस्तानी बन जाता हूँ , बहुत सी लोकल बोलियाँ मै जानता हूँ , सरकारी स्कूल में पढ़ा , सरकारी संस्थान से इंजीनियरिंग भी की , मगर मैंने कभी खुद को छोटा नहीं माना , बल्कि हमेशा गर्व किया और जो नहीं जानते थे उन्हें ये बताया क़ी हिंदी और हिन्दुस्तान क्या है ? मै बावन और बयालीस भी जानता हूँ और फिफ्टी टू और फोर्टी टू भी .
और आज भी मुझे मुंशी प्रेम चंद क़ी कहानियों में और हिंदी क़ी दूसरी कहानियों में जो रस आता है वो किसी और में नहीं आता , क्योंकि जब से मैंने बोलना सीखा तब से हिंदी ही सीखा , पहला अक्षर हिंदी का ही लिखा , ये मुझे मात्रभाषा का अर्थ समझाती है , और कोई भी दूसरी औरत जिस तरह माँ क़ी जगह नहीं ले सकती , हिंदी क़ी जगह कोई और भाषा मेरे मन हिंदी क़ी जगह नहीं ले सकती .
रही बात संस्कृति क़ी तो ज्यादातर लोग इसे दूरदर्शन का कोई पुराना कार्यक्रम या प्रायमरी का कोई विषय समझते है मगर सही मायनो में संस्कृति ये समझाती है क़ी इंसान और जानवर में क्या फर्क है . जिसे हम अंग्रेजो का मैनर्स कहते है , वो मैनर्स वो यही से सीख के गए है . क्योंकि जब इंग्लॅण्ड में लोग जंगली हुआ करते थे तब भी और उससे पहले भी हमारे यहाँ एक बेहद फलती फूलती सभ्यता और संस्कृति थी .
हमारे यहाँ लोगो के काम पहले से तय थे,मौसम क़ी भविष्यवाणी से लेकर इंसान क़ी उन्नती और विज्ञान,गणित हमारे पास विकसित थे .

इसलिए आज जो देश क़ी हालत हो रही , और लोगो में नैतिक मूल्यों में कमी हो रही है , सब जगह अपराध बढ रहे है उसके पीछे बहुत बड़ा कारण ये ही है क़ी आज बहुत कम लोग और बहुत कम किताबे है जो हमें सही या गलत बताती हैं .दुनिया के बहुत से ऐसे सर्वे हो चुके है जो ये बतलाते है क़ी बहुत अमीर लोग सिर्फ ५% ही ज्यादा खुश रहते है किसी गरीब इंसान क़ी तुलना में .मन क़ी संतुष्टी , अपनी जमीन से जुड़े रहने क़ी भावना , और अपने पे गर्व करने क़ी मानसिकता बहुत ज्यादा व्यवासियक होने से कही बड़ी है . खैर ये अपने अपने आदर्शों क़ी बात है मगर सही या गलत जानना बहुत जरूरी है , क्योंकि जब तक हम खुद के बारे में नहीं जानेंगे तब तक हमे ये नहीं पता चलेगा क़ी हम क्या है और कहा हमारी म अंजिल है|
शायद तब इस देश का और हमारे जीवन का भला होगा| क्योंकी एक तरफ बर्बादी का आलम है और जिन पे राष्ट्र को बदलने का उसे सुधारने का और परिवर्तन लाने का जिम्मा होता है, उन्हें पता ही नहीं क़ी वक़्त क़ी आंधी हमें किस गर्त में ले जा रही है | इस वक़्त को देख कर मुझे इतिहास का एक किस्सा याद आता है | जब अंग्रेज चीन पहुचे तो इतना बड़ा देश देख कर उनकी आँखे फट गयी , क्योंकि जितनी इंग्लैण्ड क़ी जनसंख्या थी उतनी तो चीन की सेना में जवान थे , या शायद उससे भी ज्यादा | उनसे लड़ा कैसे जाए ? इसके लिए उन्होंने चीन में अफीम का व्यापार करना शुरू कर दिया और चीनी जानता को नशेड़ी बना दिया | बरसों बाद चीन में अफीम युद्ध हुआ , तब तक अफीम और अंग्रेजों क़ी जड़े चीन में गहरी जम चुकी थी |
क्या ऊपर लिखे उदाहरण से हमें आज के हालातो पे और अपनी भूमिका के बारे में समानता नहीं लगती ?
शायद इसी लिए कभी स्वामी विवेकानंद ने कहा था क़ी "वेदों क़ी और लौटो " क्योंकि सब कुछ हमारे पास है , हमारी मिटटी में गडा है उसे निकालने और उसका महत्व समझने क़ी जरुरत है .वरना सिर्फ यही कहना काफी है क़ी ये लेख लिखने वाला कोई पुरानी सोच का आदमी है |


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"लिस्ट"





"सोचता हू कभी कभी एक लिस्ट बनाऊ

जिस देश मे रहता हू उसके हालतो पे कुछः अशक् बहाउ

मगर लिस्ट बडी लम्बी होगी

शायद हमारी उमर से भी ज्यादा लम्बी

कभी बगल वालो की करतूतो पे

तो कभी मह्न्गायी पे जो आज हम चावल् ४० रुपये किलो लेते हैं

कभी इक आवाज़् लगाने वाले पे लगने वाली लाठियो पे

कभी जन्गलो पे भतकटे गुमराहो पे

कभी अचानक शहीद होते जवानो पे

कभी गद्दारो पे , कभी पढे लिखे स्वर्थी लोगो पे

कभी खून चूसने वाले सफ़ेद्पोशो पे

कभी चारो ओर चलने वाले नाटक पे

कभी बरसो से चलने वाले आन्दोलनो पे

किस किस की लिस्ट बनाऊ मे

और कब् तक बनाऊ "

Monday, April 18, 2011

"कुछः इस तरह"

कुछः इस तरहः

इक खिलता है गुल् , कुछः इस तर"हः

जिन्द्गानी मे है वो

रह रह के महके, मानो गुलाबो का अर्क हो

यू तो आदत नही हमको रेशमी राहो की

बस एक मखमली संदल् सा है वो

कुछः मदमाती सी लहर सी

कुछः सब्ज़्बाग् सा मन्जर

इक ऊन्ची पहाडी पर

बाद्लो को चूमती

ओस मे भीगी हरियाली है वो

हमको तो मालूम भी नही की, है क्या

बस मेरी खुशहाली की कहानी है वो"

Sunday, April 17, 2011

"कुछः बाते"




"कुछः बाते रह रह कर मेरे कानो मे आ जाती हैं

एक रन्गीन से पुराने थैले मे से जैसे ,यादो की

नयी तितलिया निकल आती हैं

वो झूम के चलना यारो के साथ्

कुछः मीठी चाय की चुस्किया, फ़ीकी मत्ठियो के साथ्

मानो दिल की कोइ मुराद पूरी हो जाती है

यु तो कितना भटका मे ज़माने की राहो पे

मगर जाने क्यो आकर इस जमीन पे

हर तलाश खतम हो जाती है

मानो जन्ग से आये किसी सैनिक की

माशुका की बाहो मे रात गुजर जाती है

कभी बारिशो की साफ़् धुलति सडक

कभी महकती आम की बौर् की खुशबू

हर फ़िज़ा जिस जहान की मुज्हे गले लगाति है

सच कहता हू जहान की किसी जन्नत मे वो बात नही

जो मुजःको इस मिट्टी मे नजर आती है

ये वो जमीन है जिसमे घुली है मेरे बचपन की कहानिया

मेरे श्खसियत के किस्से , मेरे अतीत की, मेरे सपनो की बुनियादे

ये मोह्ब्बत है मेरी जो मुजःको पास बुलाती है

और बरसो बाद भी आज इस जमी की धूल को

माथे पे लगाने की ख्वाईश् हो जाती है

कुछः बाते रह रह के मेरे कानो मे आती है

और फ़िर् से जिन्दगी के पुराने थैले मे से यादो

की नयी तितलिया निकल आती हैं "

Tuesday, March 29, 2011

For current cricket match

Hi friends,

Today is fever of cricket world cup semi final Ind Vs Pak, to watch the cricket live just click the arshina16@Gmail.com at the bottom of my blog & enjoy.

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Thursday, February 17, 2011

"वीराने"

"रातो की खमोशियो को मिलने के बहाने आ गये

कुछः भारी अल्फ़ाज़् लबो के किनारे आ गये

यु तो कम ही रही , खुश्नुमा सी ये ज़िन्द्गि

इक बार फ़िर् दिन पुराने आ गये

ये क्या कश-म-कश लगी है जीने की

कुछः ख्वाब् सजाने की कुछः भाग जाने की

कुछः अपनी जमी मे खो जाने की

उमर भर लड कर , अब लगता है

क्या ही मज़ा आया,

ज़िन्द्गि आज़्माने मे

जो आज हर तरफ़् वीराने छा गये "

Tuesday, January 11, 2011

"गम "

"कुछः बात है कुछः अफ़्साना है

कुछः गम है कुछः तराना है

इक पुरानी सी आदत है ज़िन्दगि की

हर खुशी के साथ् गम को भी आना है

चन्द चिराग जल जाया करते हैं बहुत खून बहाने के बाद

इक झोन्के को आन्धी के , घना अन्धेरा कर जाना है

यु तो बहुत हैं साथ् चलने वाले

जाने कहा मगर हमसाये का ठिकाना है "

"दुनिया "

"दुनिया "
"ये दुनिया कभी बडी बेजार लगति है

ज़िन्द्गी बस मौत् का इन्त्ज़ार् लगती है

करे क्या हम बयान हाल-ए-दिल किसी से

सबकी नीयत अब तो बेकार लगती है "