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Saturday, August 21, 2010

निगाहों की चमक

"निगाहों की चमक

कुछ गुलों में नजाकत कम है

कुछ हवाओं में नमी है

बस तुम्हारी निगाहों की चमक

देखने को ये दुनिया थमी है"

जिन्दगी

"जिन्दगी"

"किसी रोज़ मिली थी राह में मुझको, जिन्दगी

मासूम सी बाते कुछ पूरी कुछ अधूरी

सुरमई आँखों में , कुछ शरारत , कुछ नजाकत लिए

रंगत कुछ ऐसी जैसे

इक प्याला दूध में , इक चुटकी, रंग सिन्दूरी

कुछ पूछे ,कभी कुछ बताती सी वो

अनगिनत कमसिन से सवालों में उलझती हुई

जैसे शाम हो

कुछ उजला सा दिन और कुछ रात, अँधेरी

कुछ खिल के कभी हँसना उसका

कभी शरमाना , कभी हलकी सी ओस में

गुलाबों को हवाओं का छू जाना

हर गहरी सी बात में सहमी सी वो

खिली धूप में जैसे अचानक सी छाई घटा काली गहरी

कुछ दिन भी बदले और साल बन गए

रात और दिन के साए में कुछ फासले ज़िंदगी से बन गए

अचानक इक दिन खबर मिली बहुत बुरी

ज़िंदगी खो गयी खवाबों की हकीकत में

और हर हमसाये से लापता हो गयी

वो याद उसकी दिल में ही बस गयी

फिर भी दिल से निकली बस इक दुआ

ज़िंदगी में ज़िंदगी के हर तमन्ना हो पूरी

इस दिल में ख्वाईश थी की ज़िंदगी हो मेरी

शायद तकदीर को ना थी मंजूरी

कुछ पल को रोये ,कुछ अश्क भी बहाए

फिर मुस्कुराकर कर उठे

सोचा की बस ये आवारगी है मेरी

कुछ मुफलिसी इकतरफा और इक तमन्ना अधूरी

जियेंगे कुछ यादों में क्या, मौत का इंतज़ार ही करेंगे

खुश रहे ज़िंदगी दुनिया में अपनी

ये तनहा मुफलिसी बस मेरी है मेरी

फिर कुछ साल खो गए दिन और रातो के साए में

कुछ जीने की खातिर कुछ अपनों की खातिर

हँस के नकाब-ऐ-मुस्कराहट पे गम छुपाते रहे

हो के ज़िंदगी से दूर बस जीते रहे

इक शिकस्त की कहानी तन्हाई सुनती ,हमारी

और कुछ बेमकसद, बेज़िन्दगी , ज़िंदगी हमारी

इक दिन मगर कोई ज़िंदगी में आयी

कुछ हलके से रंग, तस्वीरों के

कुछ बेमांगी बिन चाही मुराद सी हमारी

जबरन दिल में जगह बनाती

कुछ फासलों, में कुछ सवालों में

जैसे आम के बाग़ की सदाबहार हरियाली

जैसे तपती हुई , दिल की जमीन पर

ठंडी बूंदों की फुहार , ढेर सारी

निगाहों में मोहब्बत बेउम्मीद ,बेवजह

तन्हाइयों की हमारे , इक जानलेवा बीमारी

ज़िंदगी बस चलती गयी सवालो के साये में हमारी

कुछ गम ,कुछ खुशी कुछ रूठना कुछ मंनाना

इक सवाल मगर दिल में

काश इक बार मिलती हमसे ज़िंदगी हमारी

किस्मत ने दिल के दरवाजे पे दस्तक दी

इक दिन खबर आई ज़िंदगी की हकीकत की

अनगिनत किस्सों में मासूमियत के इक बेवफाई की कहानी

कागज़ की खातिर जज्बातों को बेचने की बीमारी

ये हकीकत थी मासूम खूबसूरत सी

ज़िंदगी की हकीकत सारी

कुछ खोखली सी चमक पे

कुछ बेजान सी खनक पे

और कुछ कागज़ी दिलों पे

लुटती ज़िंदगी हमारी

आज ना खुदा से कोई शिकायत है हमको

ना तकदीर से और ना किसी से

जिसे कहते थे तनहाइयों की बीमारी

सच्ची ज़िंदगी बस वो ही हमारी "

Wednesday, August 11, 2010

'आजादी का जश्न '

बहुत ही जल्द हमारे देश का स्वतंत्रता दिवस आने वाला है , जगह जगह तिरंगा फहराया जायेगा , स्कूलों में मिठाई बांटी जाएगी , ऍफ़ .एम् . और चैनलों पे देशभक्ति के गीत गाए जायेंगे , लगेगा की सचमुच हम बहुत देशभक्त देश में रहते है | लगता है की सारा देश त्याग, शांति और खुशहाली के तीन रंगों में रंग चुका है | मगर अगले दिन सब खत्म , रिश्वतखोर अपने धंधो पे फिर चले जायेंगे , भ्रष्ट सरकार और नेता अपनी काली करतूतों को फिर और जोर शोर से अंजाम देने लगेंगे , चोरी ठगी और कालाबाजारी फिर शुरू हो जाएगी | गन्दी राजनीती के चलते शहर के गुंडों से लेकर , जंगलों के आदिवासी सभी को इस्तेमाल किया जाने लगेगा | अंकल की गुलामी के चलते nuclear deal से लेकर सारी छुपी और खुली नीतियाँ बनने लगेंगी | क्या कभी हम आजाद हुए थे ? नहीं हमारी मानसिकता हमेशा से गुलाम थी और है | कभी हम अंग्रेजों के गुलाम थे , कभी मुगलों के तो कभी ducth , और फ्रांसीसियों के , कभी अपने चुने हुए नेताओं के | और तो और आज भी हम कहीं कहीं आर्थिक रूप से विकसित देशों के गुलाम है | क्या बात है की ये कमबख्त गुलामी छूटती नहीं , बड़े से बड़ा आदमी हो, कही ना कहीं गुलाम है | अपने अफसर के तो कभी ठेकेदार के तो ना जाने किस -किस के |

अगर हम पिछले एक साल की बात करे तो ऐसे -ऐसे काण्ड हुए जिन्हें मानवता पे दाग कहा जा सकता है | उदाहरण के तौर पे भोपाल गैस काण्ड , मुंबई ताज कांड ,माधुरी गुप्ता काण्ड , दिल्ली सिरिअल बम ब्लास्ट और कुछ पुराने काले कारनामों की बात करे तो निठारी काण्ड और अरुशी हत्या काण्ड | लगता है की जिस तरह हम इतिहास में अपने पूर्वजों की बहादुरी और अदम्य साहस के किस्से पढ़ते थे , हमारे वंशज हमारे घोटालों के किस्से पढेंगे | और प्रेरणा लेंगे की किस तरह बड़े घोटाले किये जाए ? जो देश अपनी सत्यवादिता और नैतिकता के लिए प्रसिद्ध था वो आने वाले १०० सालों के अन्दर अपनी भ्रष्ट छवि के लिए और प्रसिद्ध हो जायेगा | मिडिया भी वो ही दिखता है और छपता है जो उसके फायदे की बात हो | क्या ऐसी आजादी की कल्पना उन बहादुरों ने की थी जो देश के नाम हसते-हँसते शहीद हो गए ? भगत सिंह , चन्द्रशेखर आजाद और देश के सच्चे सपूतों को क्या हम सही मायनो में श्र्धांजलि दे रहे है ? क्या ये सच्ची आजादी है ? क्या ये सच्चा लोकतंत्र है ? जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , प्रेस की स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता हो ? गुप चुप होने वाले अपराध अब आम होते जा रहे है | राष्ट्रमंडल खेल और अजमल कसाब जैसे अपराधियों को पालने की तर्ज पर सरकार महंगाई बढाती जा रही है | हमारे देश का ही एक राज्य महाराष्ट्र ,जो भाषा के आधार पर अपने को अलग ही मानता है ,वहां , एक आदमी इस बात को जोर शोर से कहता है और लोग उसे highlight भी करते है| मगर जब अगले ही दिन उसी राज्य पर बड़ा हमला हो जाता है, तो देश के दूसरे हिस्सों से लोग आ कर अपना सर्वस्व बलिदान कर के अपना फ़र्ज़ देश के नाम निभा जाते है | तब वो नेता कहाँ जाता है ? क्या उसने इस देश की एकता और अखंडता का पाठ नहीं पढ़ा ? और तो और एक नेता देश के सीने पे लगे घाव पे फिल्म बनाने के लिए एक निर्माता निर्देशक को ले आता है | क्या यही देश प्रेम बचा है हम लोगों में ? क्या ये नेतृत्व हम चुनते हैं ? ये हमारी आजादी है ? अगर यही सब कुछ है तो हम सिर्फ औप्चारिक्ता कर रहे है , सिर्फ दुकानों और maalls को तिरंगे गुब्बारों से सजाना और पतंगे उडाना आजादी का जश्न मानना नहीं है |
या तो हम सिर्फ सौदेबाजी करते है या सिर्फ दिखावा करते है | सच्चा आजादी का जश्न तब होगा जब तिरंगे की शान में उठने वाले हर गलत कदम को रोक दिया जायेगा | जब राष्ट्रगान बजेगा तब सावधान की मुद्रा में हम प्रण लेंगे की जो बन सकेगा ,हम इस मिटटी की खातिर करेंगे | कुछ नहीं तो कम से कम समय पर अपना टैक्स पटायेंगे, बिना टिकेट यात्रा नहीं करंगे , हमारी गली मोहल्ले में , हमारे आस पास कुछ भी ऐसा होगा जो गलत है तो हम आवाज उठाएंगे , कभी पूरी तरह सिस्टम का हिस्सा नहीं बनगे बल्कि कोशिश करेंगे की सिस्टम को सुधार दें | कभी कोई लाइन नहीं तोड़ेंगे बल्कि लाइन तोड़ने वालों को लाइन पे ले आएंगे , चाहे गैस हो या राशन या नौकरी , कोई चीज़ ब्लैक में नहीं लेंगे बल्कि ब्लैक करने वालो को सुधरने को कोशिश करंगे | चाहे हमारी औकात कुछ भी न हो मगर अगर कोई हमारे देश की बुराई करेगा तो हम उसकी बोलती बंदकर देंगे , किसी सड़क पर अगर कागज का तिरंगा भी पड़ा होगा तो हम उसकी धूल को पोंछ कर , पूरी इज्ज़त से अपने पर्स में रख लेंगे , क्योंकि इस धूल में कई बहादुरों का खून मिला है |जिस दिन हम ये कर सके उस दिन हम सच्चा आजादी का जश्न मनाएंगे | और तब शायद हम कह सके की आज हमने थोडा सा आजादी का जश्न मनाया है |

Sunday, August 8, 2010

"अँधेरे "

"अँधेरे "

"मै अँधेरे में ही छिप के रोया करता हूँ

रौशनियाँ गम छुपाने का सबब बन जाती है

बहुत मुमकिन है की हँसते होंगे ,

लोग बहुत मेरी रफ़्तार पे

जख्मो की मेरे, याद भला किसे आती है

मै किस्सा कोई आसान नहीं

जिसे लोग यूँ ही समझ पायें

सुन सको तो सुनना कभी

अपनी हर साँस भी

दास्ताँ-ऐ-दर्द बयान कर जाती है "

Thursday, August 5, 2010

" वो "

" वो २ "
"इक खिलता है गुल , कुछ इस तरह
जिंदगानी में है वो
रह-रह के महके राहो में मेरी
मानो गुलाबों का अर्क हो
यूँ तो आदत नहीं , मुझको रेशमी राहों की
बस इक मखमली संदल सी है वो
कुछ मदमाती सी इक लहर
कुछ सब्जबाग सा हसीं इक मंज़र
इक ऊंची पहाड़ी पर बादल को चूमती
ओस में भीगी हरियाली है वो
मुझको तो पता भी नहीं आखिर है क्या
बस मेरी खुशहाली की , कहानी है वो
इक खिलता है गुल, कुछ इस तरह जिंदगानी में है वो
बड़ी आफतों में खुद को संभाला है ,उम्र भर
तन्हाईयों में डूब कर , ख़ुशी को तलाशा है उम्र भर
जाने क्या है , कोई अँधेरे घर में चुपके से आती धूप है वो
या मेरे खवाबों की हकीकत
या मेरे मनचाहे रंगों से भरी तस्वीर है वो
जो भी हो मेरी सबसे बड़ी हसरत है वो
इक खिलता है गुल ,कुछ इस तरह जिंदगानी में है वो "