मेरे ब्लॉग अपने मेल पे पाने के लिए क्लिक करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

HINDI WRITING SOFTWARE

FOR ONLINE DEGREE SERACH

Begin a new career with a degree from an online university or online college.
आवश्यक सूचना !



सभी रचनाये myfreecopyright.com के अंतर्गत सर्वाधिकार ब्लॉग ओनर के पास सुरक्षित है और ब्लॉग लेखक की लिखित अनुमति के बगैर इसका उपयोग करना सर्वथा गैरकानूनी है!



Friday, July 30, 2010

"अधूरी सी बात"


अधूरी सी बात

"जाने क्यूँ अधूरी सी है , पूरी हर बात भी

सदा ना पहुँचती खुदा तक , शायद अपने किसी जज़्बात की

यूँ तो हर गलत सजा बन के सामने आ ही जाता है

जीती नहीं मगर हमने कोई बाजी, सही अलफ़ाज़ की

किस्मत के ही हवाले रहे अक्सर दिन अपने

हालत बद भी और बदतर भी

तब यूँ सोचा की शायद अब गर्दिश सी है सितारों पे अपने

जाने क्यूँ मगर वो रौशनी नूर की नहीं दिखती आज भी

कौन कहता है की ख्वाब सिर्फ मेहनत से सच हुआ करते हैं

ये दुनिया गुलाम है ,हथेली की लकीरों के मेहराब की

कहता है दिल बस चला चल राहों पे यूँ ही

ना डर रेगिस्तानो से , और ना तमन्ना कर सब्ज बाग़ की

यूँ तो लोग चाँद पे बस्तियां बसा चुके

जमीन तो क्या आसमान को भी अपना बना चुके

मगर हो के भी सब अपना , झूठी है दुनिया ये आज की

और हर मुकम्मल ख्वाब में भी

मौजूदगी है , कहीं ना कहीं, इक अधूरी सी बात की "

Sunday, July 25, 2010

मेरा नया लेख नवभारत पर

मेरा नया लेख नवभारत पर


http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6158503.cms

Monday, July 19, 2010

"सितारों के पार"

"सितारों के पार आज , हम चलें कुछ इस कदर
के हर शब् , रौशन हो जाये नूर से हमारे
मुफलिसी में शिकायत नहीं होती
कभी किसी को किसी से
करो कुछ ऐसा की इश्क में
हर लम्हा गम का हो जाए
ज़िंदगी से दूर हमारे"

Sunday, July 18, 2010

"खुद को पाना"


अक्सर हम खुद से दूर हो जाते हैं , अपने काम में , अपनी पढाई में , अपने जिन्दगी जीने के रास्तो और उसपे अपनी जिन्दगी की गाडी चलने की धुन में भूल जाते है की , हम कैसे है, क्यों हैं ,और हमारी असल ख़ुशी क्या है ?
कभी - कभी अपने सपनो और हकीकत की कशमकश और उस पर अपने अधूरे सपनो के ढेर और उससे मिलने वाले दर्द , हमें खुद से और दूर कर देते हैं . उस पे भी जबरदस्त प्रतियोगिता वाला आज का वक़्त , हमें और ज़िंदगी से दूर कर देता है . इसलिए कुछ ना कुछ ऐसा होना चाहिए जो , हमें खुद से दूर ना होने दे . मसलन कोई साज बजाता है , कोई तस्वीरें बनता है , कोई हवाओं में उंगली की नोक से अपने ख़्वाबों के महल बनता है , कहे तो एक अजीब दुनिया में जीने की कोशिश करता है , उस वक़्त उस ख़ुशी को वो शायद किसी को समझा नहीं सकता , मानो गूंगे का गुड हो , जिसे वो किसी से कह नहीं सकता मगर अन्दर ही अन्दर खुश होता है .
ज़िंदगी बड़ी उलझी हुई चीज़ है , ख़्वाबों का अधूरापन उनके पूरे होने में भी शामिल रहता है . चाहे आप कुछ भी कर ले , कुछ भी पा ले , मगर मन की ख़ुशी खुद को पा लेने में ही मिलती है . अकसर औरों की तरह जीने की कोशिश में भी, हम भटक जाते है , और आज कल तो कला को भी बाजार बना दिया गया है . मै अपनी कहूँ तो मै लिखता सिर्फ इसलिए हूँ की , मै इसी में रहता हूँ , मेरी शख्सियत और मेरा वजूद इन्ही कागजों में है , औरों के लिए मै बहुत कुछ हूँ मगर अपने खुद के लिए मै कलम का दीवाना हूँ , मेरा आस्मां ये है और मेरी दुनिया भी यही है. मेरी उड़ान भी यही और मेरा दिल भी यही , मेरा शौक भी यही .

जब कभी मै कई दिनों तक लिख नहीं पता तो मै चिडचिडा हो जाता हूँ , मेरा किसी काम में मन नहीं लगता , ये सफ़ेद जमीन मेरी तलब है और मै इसक तलबगार. मुझे ख़ुशी है की मुझे अपनी तलब पता है . इसके साथ कभी मै अपने सपनो को जी लेता हूँ तो कभी अपनी बुराइयों और कमियों को जान भी लेता हूँ . अपने आप से मिलने में मुझे अजीब सुकून मिलता है . कुछ हरे बड़े और बहुत बड़े मैदान , कुछ ऊंचे पहाड़ और कुछ नीली झीलें मुझे लिखने को और भी मजबूर कर देती है . शायद इस लिए कहता हूँ ,की कुछ ना कुछ ऐसा जिन्दा रखो अपने अन्दर जो सिर्फ तुम्हारा हो . और मै क्या कहता हूँ दुनिया के बहुत बड़े - बड़े लोगों ने भी कहा है , इक मशहूर शायर ने कहा है की :
इक रोग पाल लो ज़िंदगी के वास्ते
ज़िंदगी कटती नहीं सेहत के सहारे
तो आखिर में, दुनिया को पाना कुछ पाना नहीं , बात तो तब है जब खुद को पा सको .

Saturday, July 10, 2010

"बारिश की दिल्ली वालो से दुश्मनी "

बारिश की दिल्ली वालो से दुश्मनी
जाने क्या बात है की दिल्ली के आस पास हिमाचल और उत्तरांचल जैसे खूबसूरत राज्यों के बावजूद , बारिश सब जगह होती है मगर दिल्ली प्यासी ही रह जाती है ? कभी हलकी सी बारिश होती भी है तो मिडिया ऐसा हल्ला करता है और सड़कों पे ऐसा जाम लग जाता है की , बारिश रूठ के चली जाती है . कुछ लोग कहते है की दिल्ली में सबसे ज्यादा पापी भरे पड़े है शायद इस लिए ही दिल्ली में बारिश नहीं होती , ये कारण भी सही लगता है क्योंकि , सारे बड़े नेता , राजनेता और भ्रष्ट नेता यही तो रहते हैं . जितना बड़ा नेता उसके दामन पे उतना बड़ा दाग . क्या करे प्रजा तंत्र होता ही ऐसा है. फिर चाहे बात भोपाल गैस काण्ड में मरने और यातना भोगने वाले लाखों लोगों की हो या बोफोर्स काण्ड हो या कोई और राजनैतिक घोटाला , सजा तो दिल्ली को ही भुगतनी पड़ती है. मंत्री जी कहते है की दिल्ली वाले महंगाई झेल सकने में सक्षम है , कोई उनसे कहे की कभी एक बार जरा दिल्ली की सड़कों में कूड़ा बीनने वालो या सिग्नल पे भीख मांगने वाले बच्चों से मिल कर आये , तो पता चलेगा की कितने दिल्ली वाले महंगाई की मार झेलने की तैयार है ?
ऐसा लगता है सरकार और सरकारी तंत्र लूटने में लगा है , क्या देश प्रेम? क्या फ़र्ज़ और क्या जिम्मेदारी , ना उन्हें कोई परवाह है ना कोई सरोकार और ना ही सरकार गिरने का कोई डर . ना इस बात की चिंता की पडोसी देशों से क्या नुक्सान हो सकता है , और ना ही ये की आने वाले समय में हमारे सामने कौन कौन सी समस्याए आएँगी ? उल्टा सब लूटने में लगे है और शकीरा और फुटबाल में व्यस्त है. शायद इसलिए दिल्ली प्यासी है , खुशहाली के बादल आते है और बिन बरसे चले जाते है , आम जनता को भी प्यासा ही छोड़ जाते है , क्योंकि कही ना कही वो भी पापी है , जो उन पापियों को चुनती है राज करने के लिए.