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Tuesday, November 23, 2010

"जाने दिल क्यू भारी है आज"

"जाने दिल क्यू भारी है आज

इक अजीब् सी उदास रात

महकी चान्द्नी कुछः दूर कुछः पास

कुछः तूटते ख्वाब् कुछः बेजान अरमान

कुछः अपनो के अश्को कि बरसात

और कुछः अजीब् सी पशोपेश मे फ़न्सा इक इन्सान

इक मोह्ब्बत से बसायी बस्ती मे सुलगति

इक ज़िन्दा आग

जाने दिल क्यू भारी है आज

इक अजीब् सी उदास रात

कुछः वक़्त भी आगे सा निकल चुका

कुछः ज़माना नया सा हो चुका

अब सजा क्या दे हम खुद को

इक दिल भी अपना रहने वाले भी खास

जाने दिल क्यू भारी है आज "

Monday, November 1, 2010

तमन्ना

"तमन्ना "

"कुछः हूर कि ख्वाइश् थी

कभी चान्द् का इराद था

इक महका सा गुलाब् था कभी

ख्वाबो मे

हर दुआ मे जिसको मान्गा था

इक सादगी मे लिप्टी वो

वो तमन्ना मेरी मिली कुछः इस कदर

के पता ही नही चला

यहि थी वो
जिसको हमे पाना था "

"दास्तान"

"दस्तान "

हम ही कहते रहे कि

जमाने से के ख्वाब् बुना करो

मुमकिन तो नही कि हर खवाब् पूरे हो

मगर ख्वाहीश् तो पता हो

यू तो बहुत देखा ख्वाब् बुनने वालो को रोते

इक मुक्कंमल् ख्वाब् कि खुशी , मगर

हर अधूरी तमन्ना से जुदा हो

और कब् तक रहोगे तकदीरो के भरोसे

कोइ तो हो मन्जिल जिसके पीछे

गमो कि लम्बी दस्तान हो

"हसरत "

"हसरत "

"जाने कब् अन्धेरो का सफ़र् खतम हुआ

नूर कि इक किरन जग्मगायी है

यू तो दोस्ती हमारी गमो से ही रही

अब तक

इक मुस्कान अब लबो पे छाई है

क्या कहु तुम्हे , मेरी खुश्नसीबी या दुआ कोई

या कोई हसरत दिल कि अधूरी

जो आज मुकंमल् हो पायी है "

Monday, September 27, 2010

"छोटी सी मौज"

"चंद लकीरों ने हथेली क़ी

बहुत सताया है अक्सर

हमने भी मगर अफताब-ऐ-असमान से

नज़रें लड़ने क़ी कसम खायी है

मालूम है राहों में

आगे तूफ़ान बहुत हैं , मगर

दिल में मंजिल से मोहब्बत

क़ी खुमारी छाई है

यूँ ना कहा करो हमसे

क़ी तेरे बस क़ी नहीं ये शय

छोटी सी मौज ने भी अक्सर

सैकड़ों कश्तियाँ डुबाई हैं "

Tuesday, September 21, 2010

"सोचने भर से कम सकते हैं दौलत "

"सोचने भर से कम सकते हैं दौलत "
आश्चर्य हुआ ना ? मुझे भी हुआ था , मगर इस लेख को पढ़ने के बाद शायद ना हो कॉपी पेस्ट करें :


http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6536984.cms

Sunday, September 19, 2010

"यार गद्दार "

"ये बात है बड़ी पुरानी

घिसी पिटी सी , मगर

आज है सबको बतानी

जब हम कालेज में हुआ करते थे

हम थे दिल के राजा

और एक थी हमारी रानी

जब भी हम चला करते थे

शाम को अपने लोहे के यान पर

मानो छूटा हो तीर

जो था अभी -अभी कमान पर

और जो चिपक के बैठती

हमसे हमारे सपनो क़ी रानी

देख कर उसकी रंगत

बदन क़ी नजाकत और रवानी

बूढ़े भी मांगते ऊपरवाले से जवानी

खुद क़ी किस्मत पे हम इतराया करते थे

रानी के साथ रोज गुलछर्रे उड़ाया करते थे

सैकड़ो वादों और कसमों क़ी लम्बी कहानी

मगर हमें क्या पता था

क़ी किसी शातिर क़ी नज़र

हमारे अर्धनग्न जीवन संग पर होती है

और देख कर साथ उसके सीने में

भी जलन होती है

उसने पहले तो हमसे दोस्ती के पेंग बढ़ाये

ज़माने के सामने वफादारी के अपने

किस्से सुनाये

मगर हमें क्या पता था

जिसे दुकान का चोकीदार बना रहे है

उसके लिए वफ़ा थी बेमानी

उसकी नज़रों में थी हमारी रानी

इक दिन बहाने से उसने

हमें रानी के खिलाफ भड़काया

रानी से हमें लड़ाया

उधर खफा रानी को मनाया

उसकी तरफ अपना फेविकोल लगा कन्धा बढाया

इक बार जो लिया सहारा रानी ने

चिपक कर रह गयी उससे हमारी रानी

और हमारी मोहब्बत हो गयी उसके लिए बेमानी

नकली चोट देख कर उसकी वो आंसू बहाती

और हमारे टूटे दिल पे और चोट दे जाती

इक दिन हमें भी गुस्सा आया

खींच के आस्तीन के सांप को घूँसा लगाया

कहा साले बेईमान

दूर हो जा नजरों से हमारी

और ले जा साथ में बेवफा बेअकल रानी

जो मेरी ना हुई वो तेरी क्या होगी

तुझ जैसे यार गद्दार क़ी है बेकार जिंदगानी "

अनिल मिस्त्री

Saturday, September 18, 2010

"इकराज़ "

"इक राज़ तेरी निगाहों से यूँ ही

ब्यान होता है

कोई है आस पास मेरे जो ,

ख्यालों में मेरे ख्वाबो सा जवान होता है

कुछ दीवानगी तेरी ख्वाईश में

कुछ दिल्लगी का सामान भी होता है

मुझको परवाह नहीं कि हूर हो

या हो कोई आफत इस दुनिया कि

बस वफ़ा का नगमा सुनने को

दिल तरसता है

इक लिबाज़ हसीं में तेरा

संगमरमरी जिस्म छिपने

को डरता है

कभी भीगी सी हवाओं में

कभी आधी सोयी फजाओं में

इक नीली सी झील में

तेरा अक्स देखने को

ये दिल रोता है "

"बेशरम का फूल "






"बेशरम का फूल "

कभी आपने बेशरम का फूल या पौधा देखा है ? नदी नालों के किनारे , गीली और दलदली जमीन पे उगने वाली ये घनी जंगली झाड़ीनुमा पौध अकसर आपको डबरों और दलदलो के किनारे दिख जाएगी | ये बहुत तेजी से बढ़ने वाली और काफी जल्दी ऊंची हो जाने वाली झाड़ी है | पानी साफ़ हो या गन्दा ये बहुत तेजी से फलते फूलते है और विकसित हो जाते है | जब ये पूर्णतः विकसित हो जाते हैं तो इनमे नीले जमुनी रंग के जासौन के जैसे फूल खिलते हैं |
अब सवाल ये उठता है कि, एक जंगली पौधे में या इसके फूलों में ऐसा क्या ख़ास है कि मै इसका वर्णन इतने विस्तारपूर्वक कर रहा हूँ ? एक जंगली झाड़ी को इतना महत्व देने का क्या अर्थ है ? हाँ अगर बात गुलाब या चमेली जैसे शाही फूल या पौधे कि हो तो बात भी बनती है , जिससे खुशबूदार तेल , गुलकंद और अर्क नाम कि उपयोगी और बाजारू चीजें बनायीं जा सके | इसके अलावा बेशरम के फूल में न तो महक होती है और ना ही इसका कोई ख़ास इस्तेमाल होता है | मगर एक बात है जो मुझे बार-बार इस पौधे कि तरफ आकर्षित करती है , वो है इसकी जीवटता | जो ना तो बाज़ार में कहीं मिल सकती है और ना ही कहीं और खरीदी या बेचीं जा सकती है | ठण्ड हो ,बारिश हो ,धूप हो ,गर्मी हो , ये बढ़ता और फलता फूलता ही जाता है और सदैव हरा ही रहता है | आप इसे उखाड़े या लगा रहने दे ये कई दिनों तक बिना खाद और पानी के बढ़ते रहते हैं | हर मौसम में इनके नीले जामुनी रंग के फूल खलखिलाते रहते हैं | शायद इसलिए इसे 'बेशरम ' कहा जाता है , दरअसल ये इसका उपहास नहीं है बल्कि इसकी जीवटता कि प्रशंशा है | शायद अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग -अलग नाम से पुकारा जाता हो , और इसका वज्ञानिक नाम भी मै नहीं जानता| मगर ना तो ये कोई वज्ञानिक लेख है और ना ही गप्प | हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश के लोग बेशरम कि झाडी से भलीभांति परिचित हैं , जो हर मौसम और हर परिस्थिति में भी हरी भरी रहती है | और सबसे खास बात इसमें कैक्टस कि भांति कांटे भी नहीं होते | मानो जीवटता और उस पे से विनम्रता भी |

विपरीत परिस्थितियों में तो बहुत से लोग जी लेते हैं , उन्नति भी कर लेते हैं , मगर वो कठोर हो जाते हैं | उनका व्यवहार कैक्टुस कि भांति हो जाता है , उनकी मिठास ख़तम हो जाती है | वो हरे भरे तो रहते हैं मगर असभ्य ,कठोर और खडूस हो जाते हैं | मगर जीवन के अती कठिनतम रास्तों पे चल कर और विपरीत परिस्थितयों को झेल कर भी उन्नति करना और विनम्रता को सहेज कर रखना कोई बेशरम के फूल से सीखे |
अपने साथ समय और भाग्य ने जो भी किया हो मगर हम सदैव दुनिया को अपनी मुस्कराहट ही देते रहंगे | क्या हम भारत के लोगों कि छवी सारी दुनिया में कुछ ऐसी ही नहीं है ? क्या जीवटता और विनम्रता के ये गुण भारतीयता कि पहचान नहीं हैं ? आज भी हमरे देश के कई ऐसे लोग हैं जो सुदूर गावों में रहे हैं ,जहाँ नाम मात्र कि भी सुविधाएं नहीं रही , मगर वो वहां पले बढे और आज सारी दुनिया में नाम रौशन कर रहे हैं |
इसके अलावा उनके व्यवहार में किसी के प्रति भी नाराजगी नजर नहीं आती | कहा जाता है कि अमेरिका अपनी प्रगतिशीलता के कारण प्रसिध्द है , जर्मनी अपनी उर्जावान जानता के कारण , यूरोप अपनी सम्पन्नता के लिए , मगर हम भारतीय अपनी प्रगतिशील मानसिकता और कार्यकुशलता और अछे व्यवहार के लिए प्रसिध्द हैं | क्या इतना महानतम व्यक्तित्व और परिचय बेशरम के फूल के लिए गलत है ?
हम भारतियों ने कभी किसी देश पे बेवजह बम नहीं फेंका , किसी दवा को बेचने के लिए अफवाहों का सहारा नहीं लिया , कभी किसी कि जमीन पे बेवजह कब्ज़ा नहीं किया , बल्कि हम सदैव गरीबी, बेकारी , अकाल , भ्रष्टाचार , उग्रवाद, नक्सलवाद , महंगाई और अनेकों समस्याओं से जूझते रहे | मगर फिर भी सदैव हमने बेशरम क़ी झाड़ी क़ी तरह विकास किया , उन्नति क़ी | बेशरम क़ी झाड़ी क़ी ही तरह हमने अनेकों बार साँपों को शरण दी मगर हमार व्यवहार कभी विषैला नहीं हुआ , बल्कि इन तमाम समस्याओं के बावजूद हम सदैव उन्नतिशील रहे |
आज भी जब मै किसी खबर में सुनता हूँ या देखता हूँ क़ी विदेशों में भारतियों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है तो मुझे दुःख होता है | आज भी भारतीय पेशेवर चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो , सबसे कुशल और महंगे माने जाते है , मगर फिर भी हम अपने मेहमानों का स्वागत पूरी गर्मजोशी और अपनी प्रगतिशील मुस्कान के साथ करते हैं |

ठीक इसी तरह ये बेशरम का पौधा हमें प्रेरणा देता है निरंतर किसी अविरल बहने वाले झरने क़ी तरह उन्नति करने क़ी , और सदैव मुस्कुराने क़ी बिना डरे, बिना रुके कठिन से कठिन रास्तों पे आगे बढ़ने क़ी | और सदैव पुष्पित और पल्लवित होने क़ी | ये पौधा और इसके फूल कुछ यूँ कहते हैं क़ी मेरे पास ना कोई माली है , ना कोई देख रेख करने वाला , ना कोई खाद , पानी देने वाला , मुझमे सिर्फ जिद है सदैव आगे बढ़ने क़ी और अपने साथ हुए बुरे व्यवहार को भूल कर उन्नति करने क़ी |

तो आईये इस गलाकाट पर्तिस्पर्धा के युग में अच्छा सोचें और बेशरम के फूल क़ी तरह जीवट और विनम्र बने |
आपका
अनिल मिस्त्री

Saturday, September 4, 2010

" फासले "

" फासले "

"आओ कुछ नज़रों से हमारी

शिकायत कर लो

नजर क्या चीज़ है

कुछ जुबान से भी

मोहब्बत कम कर लो

हर सितम मंजूर है आपका

बस जरा दिल से हमारे

फासले कम कर लो

माना की कुछ रूठे से लगते हो

कब्रगाह पे बिखरी चांदनी से दिखते हो

इक हंसी से दुनिया हमारी आबाद कर दो

हर शिकायत हो जाएगी

दूर हमसे

बस बाहों में आकर

धडकनों में हमारी

नाम अपना सुन लो "

Saturday, August 21, 2010

निगाहों की चमक

"निगाहों की चमक

कुछ गुलों में नजाकत कम है

कुछ हवाओं में नमी है

बस तुम्हारी निगाहों की चमक

देखने को ये दुनिया थमी है"

जिन्दगी

"जिन्दगी"

"किसी रोज़ मिली थी राह में मुझको, जिन्दगी

मासूम सी बाते कुछ पूरी कुछ अधूरी

सुरमई आँखों में , कुछ शरारत , कुछ नजाकत लिए

रंगत कुछ ऐसी जैसे

इक प्याला दूध में , इक चुटकी, रंग सिन्दूरी

कुछ पूछे ,कभी कुछ बताती सी वो

अनगिनत कमसिन से सवालों में उलझती हुई

जैसे शाम हो

कुछ उजला सा दिन और कुछ रात, अँधेरी

कुछ खिल के कभी हँसना उसका

कभी शरमाना , कभी हलकी सी ओस में

गुलाबों को हवाओं का छू जाना

हर गहरी सी बात में सहमी सी वो

खिली धूप में जैसे अचानक सी छाई घटा काली गहरी

कुछ दिन भी बदले और साल बन गए

रात और दिन के साए में कुछ फासले ज़िंदगी से बन गए

अचानक इक दिन खबर मिली बहुत बुरी

ज़िंदगी खो गयी खवाबों की हकीकत में

और हर हमसाये से लापता हो गयी

वो याद उसकी दिल में ही बस गयी

फिर भी दिल से निकली बस इक दुआ

ज़िंदगी में ज़िंदगी के हर तमन्ना हो पूरी

इस दिल में ख्वाईश थी की ज़िंदगी हो मेरी

शायद तकदीर को ना थी मंजूरी

कुछ पल को रोये ,कुछ अश्क भी बहाए

फिर मुस्कुराकर कर उठे

सोचा की बस ये आवारगी है मेरी

कुछ मुफलिसी इकतरफा और इक तमन्ना अधूरी

जियेंगे कुछ यादों में क्या, मौत का इंतज़ार ही करेंगे

खुश रहे ज़िंदगी दुनिया में अपनी

ये तनहा मुफलिसी बस मेरी है मेरी

फिर कुछ साल खो गए दिन और रातो के साए में

कुछ जीने की खातिर कुछ अपनों की खातिर

हँस के नकाब-ऐ-मुस्कराहट पे गम छुपाते रहे

हो के ज़िंदगी से दूर बस जीते रहे

इक शिकस्त की कहानी तन्हाई सुनती ,हमारी

और कुछ बेमकसद, बेज़िन्दगी , ज़िंदगी हमारी

इक दिन मगर कोई ज़िंदगी में आयी

कुछ हलके से रंग, तस्वीरों के

कुछ बेमांगी बिन चाही मुराद सी हमारी

जबरन दिल में जगह बनाती

कुछ फासलों, में कुछ सवालों में

जैसे आम के बाग़ की सदाबहार हरियाली

जैसे तपती हुई , दिल की जमीन पर

ठंडी बूंदों की फुहार , ढेर सारी

निगाहों में मोहब्बत बेउम्मीद ,बेवजह

तन्हाइयों की हमारे , इक जानलेवा बीमारी

ज़िंदगी बस चलती गयी सवालो के साये में हमारी

कुछ गम ,कुछ खुशी कुछ रूठना कुछ मंनाना

इक सवाल मगर दिल में

काश इक बार मिलती हमसे ज़िंदगी हमारी

किस्मत ने दिल के दरवाजे पे दस्तक दी

इक दिन खबर आई ज़िंदगी की हकीकत की

अनगिनत किस्सों में मासूमियत के इक बेवफाई की कहानी

कागज़ की खातिर जज्बातों को बेचने की बीमारी

ये हकीकत थी मासूम खूबसूरत सी

ज़िंदगी की हकीकत सारी

कुछ खोखली सी चमक पे

कुछ बेजान सी खनक पे

और कुछ कागज़ी दिलों पे

लुटती ज़िंदगी हमारी

आज ना खुदा से कोई शिकायत है हमको

ना तकदीर से और ना किसी से

जिसे कहते थे तनहाइयों की बीमारी

सच्ची ज़िंदगी बस वो ही हमारी "

Wednesday, August 11, 2010

'आजादी का जश्न '

बहुत ही जल्द हमारे देश का स्वतंत्रता दिवस आने वाला है , जगह जगह तिरंगा फहराया जायेगा , स्कूलों में मिठाई बांटी जाएगी , ऍफ़ .एम् . और चैनलों पे देशभक्ति के गीत गाए जायेंगे , लगेगा की सचमुच हम बहुत देशभक्त देश में रहते है | लगता है की सारा देश त्याग, शांति और खुशहाली के तीन रंगों में रंग चुका है | मगर अगले दिन सब खत्म , रिश्वतखोर अपने धंधो पे फिर चले जायेंगे , भ्रष्ट सरकार और नेता अपनी काली करतूतों को फिर और जोर शोर से अंजाम देने लगेंगे , चोरी ठगी और कालाबाजारी फिर शुरू हो जाएगी | गन्दी राजनीती के चलते शहर के गुंडों से लेकर , जंगलों के आदिवासी सभी को इस्तेमाल किया जाने लगेगा | अंकल की गुलामी के चलते nuclear deal से लेकर सारी छुपी और खुली नीतियाँ बनने लगेंगी | क्या कभी हम आजाद हुए थे ? नहीं हमारी मानसिकता हमेशा से गुलाम थी और है | कभी हम अंग्रेजों के गुलाम थे , कभी मुगलों के तो कभी ducth , और फ्रांसीसियों के , कभी अपने चुने हुए नेताओं के | और तो और आज भी हम कहीं कहीं आर्थिक रूप से विकसित देशों के गुलाम है | क्या बात है की ये कमबख्त गुलामी छूटती नहीं , बड़े से बड़ा आदमी हो, कही ना कहीं गुलाम है | अपने अफसर के तो कभी ठेकेदार के तो ना जाने किस -किस के |

अगर हम पिछले एक साल की बात करे तो ऐसे -ऐसे काण्ड हुए जिन्हें मानवता पे दाग कहा जा सकता है | उदाहरण के तौर पे भोपाल गैस काण्ड , मुंबई ताज कांड ,माधुरी गुप्ता काण्ड , दिल्ली सिरिअल बम ब्लास्ट और कुछ पुराने काले कारनामों की बात करे तो निठारी काण्ड और अरुशी हत्या काण्ड | लगता है की जिस तरह हम इतिहास में अपने पूर्वजों की बहादुरी और अदम्य साहस के किस्से पढ़ते थे , हमारे वंशज हमारे घोटालों के किस्से पढेंगे | और प्रेरणा लेंगे की किस तरह बड़े घोटाले किये जाए ? जो देश अपनी सत्यवादिता और नैतिकता के लिए प्रसिद्ध था वो आने वाले १०० सालों के अन्दर अपनी भ्रष्ट छवि के लिए और प्रसिद्ध हो जायेगा | मिडिया भी वो ही दिखता है और छपता है जो उसके फायदे की बात हो | क्या ऐसी आजादी की कल्पना उन बहादुरों ने की थी जो देश के नाम हसते-हँसते शहीद हो गए ? भगत सिंह , चन्द्रशेखर आजाद और देश के सच्चे सपूतों को क्या हम सही मायनो में श्र्धांजलि दे रहे है ? क्या ये सच्ची आजादी है ? क्या ये सच्चा लोकतंत्र है ? जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , प्रेस की स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता हो ? गुप चुप होने वाले अपराध अब आम होते जा रहे है | राष्ट्रमंडल खेल और अजमल कसाब जैसे अपराधियों को पालने की तर्ज पर सरकार महंगाई बढाती जा रही है | हमारे देश का ही एक राज्य महाराष्ट्र ,जो भाषा के आधार पर अपने को अलग ही मानता है ,वहां , एक आदमी इस बात को जोर शोर से कहता है और लोग उसे highlight भी करते है| मगर जब अगले ही दिन उसी राज्य पर बड़ा हमला हो जाता है, तो देश के दूसरे हिस्सों से लोग आ कर अपना सर्वस्व बलिदान कर के अपना फ़र्ज़ देश के नाम निभा जाते है | तब वो नेता कहाँ जाता है ? क्या उसने इस देश की एकता और अखंडता का पाठ नहीं पढ़ा ? और तो और एक नेता देश के सीने पे लगे घाव पे फिल्म बनाने के लिए एक निर्माता निर्देशक को ले आता है | क्या यही देश प्रेम बचा है हम लोगों में ? क्या ये नेतृत्व हम चुनते हैं ? ये हमारी आजादी है ? अगर यही सब कुछ है तो हम सिर्फ औप्चारिक्ता कर रहे है , सिर्फ दुकानों और maalls को तिरंगे गुब्बारों से सजाना और पतंगे उडाना आजादी का जश्न मानना नहीं है |
या तो हम सिर्फ सौदेबाजी करते है या सिर्फ दिखावा करते है | सच्चा आजादी का जश्न तब होगा जब तिरंगे की शान में उठने वाले हर गलत कदम को रोक दिया जायेगा | जब राष्ट्रगान बजेगा तब सावधान की मुद्रा में हम प्रण लेंगे की जो बन सकेगा ,हम इस मिटटी की खातिर करेंगे | कुछ नहीं तो कम से कम समय पर अपना टैक्स पटायेंगे, बिना टिकेट यात्रा नहीं करंगे , हमारी गली मोहल्ले में , हमारे आस पास कुछ भी ऐसा होगा जो गलत है तो हम आवाज उठाएंगे , कभी पूरी तरह सिस्टम का हिस्सा नहीं बनगे बल्कि कोशिश करेंगे की सिस्टम को सुधार दें | कभी कोई लाइन नहीं तोड़ेंगे बल्कि लाइन तोड़ने वालों को लाइन पे ले आएंगे , चाहे गैस हो या राशन या नौकरी , कोई चीज़ ब्लैक में नहीं लेंगे बल्कि ब्लैक करने वालो को सुधरने को कोशिश करंगे | चाहे हमारी औकात कुछ भी न हो मगर अगर कोई हमारे देश की बुराई करेगा तो हम उसकी बोलती बंदकर देंगे , किसी सड़क पर अगर कागज का तिरंगा भी पड़ा होगा तो हम उसकी धूल को पोंछ कर , पूरी इज्ज़त से अपने पर्स में रख लेंगे , क्योंकि इस धूल में कई बहादुरों का खून मिला है |जिस दिन हम ये कर सके उस दिन हम सच्चा आजादी का जश्न मनाएंगे | और तब शायद हम कह सके की आज हमने थोडा सा आजादी का जश्न मनाया है |

Sunday, August 8, 2010

"अँधेरे "

"अँधेरे "

"मै अँधेरे में ही छिप के रोया करता हूँ

रौशनियाँ गम छुपाने का सबब बन जाती है

बहुत मुमकिन है की हँसते होंगे ,

लोग बहुत मेरी रफ़्तार पे

जख्मो की मेरे, याद भला किसे आती है

मै किस्सा कोई आसान नहीं

जिसे लोग यूँ ही समझ पायें

सुन सको तो सुनना कभी

अपनी हर साँस भी

दास्ताँ-ऐ-दर्द बयान कर जाती है "

Thursday, August 5, 2010

" वो "

" वो २ "
"इक खिलता है गुल , कुछ इस तरह
जिंदगानी में है वो
रह-रह के महके राहो में मेरी
मानो गुलाबों का अर्क हो
यूँ तो आदत नहीं , मुझको रेशमी राहों की
बस इक मखमली संदल सी है वो
कुछ मदमाती सी इक लहर
कुछ सब्जबाग सा हसीं इक मंज़र
इक ऊंची पहाड़ी पर बादल को चूमती
ओस में भीगी हरियाली है वो
मुझको तो पता भी नहीं आखिर है क्या
बस मेरी खुशहाली की , कहानी है वो
इक खिलता है गुल, कुछ इस तरह जिंदगानी में है वो
बड़ी आफतों में खुद को संभाला है ,उम्र भर
तन्हाईयों में डूब कर , ख़ुशी को तलाशा है उम्र भर
जाने क्या है , कोई अँधेरे घर में चुपके से आती धूप है वो
या मेरे खवाबों की हकीकत
या मेरे मनचाहे रंगों से भरी तस्वीर है वो
जो भी हो मेरी सबसे बड़ी हसरत है वो
इक खिलता है गुल ,कुछ इस तरह जिंदगानी में है वो "

Friday, July 30, 2010

"अधूरी सी बात"


अधूरी सी बात

"जाने क्यूँ अधूरी सी है , पूरी हर बात भी

सदा ना पहुँचती खुदा तक , शायद अपने किसी जज़्बात की

यूँ तो हर गलत सजा बन के सामने आ ही जाता है

जीती नहीं मगर हमने कोई बाजी, सही अलफ़ाज़ की

किस्मत के ही हवाले रहे अक्सर दिन अपने

हालत बद भी और बदतर भी

तब यूँ सोचा की शायद अब गर्दिश सी है सितारों पे अपने

जाने क्यूँ मगर वो रौशनी नूर की नहीं दिखती आज भी

कौन कहता है की ख्वाब सिर्फ मेहनत से सच हुआ करते हैं

ये दुनिया गुलाम है ,हथेली की लकीरों के मेहराब की

कहता है दिल बस चला चल राहों पे यूँ ही

ना डर रेगिस्तानो से , और ना तमन्ना कर सब्ज बाग़ की

यूँ तो लोग चाँद पे बस्तियां बसा चुके

जमीन तो क्या आसमान को भी अपना बना चुके

मगर हो के भी सब अपना , झूठी है दुनिया ये आज की

और हर मुकम्मल ख्वाब में भी

मौजूदगी है , कहीं ना कहीं, इक अधूरी सी बात की "

Sunday, July 25, 2010

मेरा नया लेख नवभारत पर

मेरा नया लेख नवभारत पर


http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6158503.cms

Monday, July 19, 2010

"सितारों के पार"

"सितारों के पार आज , हम चलें कुछ इस कदर
के हर शब् , रौशन हो जाये नूर से हमारे
मुफलिसी में शिकायत नहीं होती
कभी किसी को किसी से
करो कुछ ऐसा की इश्क में
हर लम्हा गम का हो जाए
ज़िंदगी से दूर हमारे"

Sunday, July 18, 2010

"खुद को पाना"


अक्सर हम खुद से दूर हो जाते हैं , अपने काम में , अपनी पढाई में , अपने जिन्दगी जीने के रास्तो और उसपे अपनी जिन्दगी की गाडी चलने की धुन में भूल जाते है की , हम कैसे है, क्यों हैं ,और हमारी असल ख़ुशी क्या है ?
कभी - कभी अपने सपनो और हकीकत की कशमकश और उस पर अपने अधूरे सपनो के ढेर और उससे मिलने वाले दर्द , हमें खुद से और दूर कर देते हैं . उस पे भी जबरदस्त प्रतियोगिता वाला आज का वक़्त , हमें और ज़िंदगी से दूर कर देता है . इसलिए कुछ ना कुछ ऐसा होना चाहिए जो , हमें खुद से दूर ना होने दे . मसलन कोई साज बजाता है , कोई तस्वीरें बनता है , कोई हवाओं में उंगली की नोक से अपने ख़्वाबों के महल बनता है , कहे तो एक अजीब दुनिया में जीने की कोशिश करता है , उस वक़्त उस ख़ुशी को वो शायद किसी को समझा नहीं सकता , मानो गूंगे का गुड हो , जिसे वो किसी से कह नहीं सकता मगर अन्दर ही अन्दर खुश होता है .
ज़िंदगी बड़ी उलझी हुई चीज़ है , ख़्वाबों का अधूरापन उनके पूरे होने में भी शामिल रहता है . चाहे आप कुछ भी कर ले , कुछ भी पा ले , मगर मन की ख़ुशी खुद को पा लेने में ही मिलती है . अकसर औरों की तरह जीने की कोशिश में भी, हम भटक जाते है , और आज कल तो कला को भी बाजार बना दिया गया है . मै अपनी कहूँ तो मै लिखता सिर्फ इसलिए हूँ की , मै इसी में रहता हूँ , मेरी शख्सियत और मेरा वजूद इन्ही कागजों में है , औरों के लिए मै बहुत कुछ हूँ मगर अपने खुद के लिए मै कलम का दीवाना हूँ , मेरा आस्मां ये है और मेरी दुनिया भी यही है. मेरी उड़ान भी यही और मेरा दिल भी यही , मेरा शौक भी यही .

जब कभी मै कई दिनों तक लिख नहीं पता तो मै चिडचिडा हो जाता हूँ , मेरा किसी काम में मन नहीं लगता , ये सफ़ेद जमीन मेरी तलब है और मै इसक तलबगार. मुझे ख़ुशी है की मुझे अपनी तलब पता है . इसके साथ कभी मै अपने सपनो को जी लेता हूँ तो कभी अपनी बुराइयों और कमियों को जान भी लेता हूँ . अपने आप से मिलने में मुझे अजीब सुकून मिलता है . कुछ हरे बड़े और बहुत बड़े मैदान , कुछ ऊंचे पहाड़ और कुछ नीली झीलें मुझे लिखने को और भी मजबूर कर देती है . शायद इस लिए कहता हूँ ,की कुछ ना कुछ ऐसा जिन्दा रखो अपने अन्दर जो सिर्फ तुम्हारा हो . और मै क्या कहता हूँ दुनिया के बहुत बड़े - बड़े लोगों ने भी कहा है , इक मशहूर शायर ने कहा है की :
इक रोग पाल लो ज़िंदगी के वास्ते
ज़िंदगी कटती नहीं सेहत के सहारे
तो आखिर में, दुनिया को पाना कुछ पाना नहीं , बात तो तब है जब खुद को पा सको .

Saturday, July 10, 2010

"बारिश की दिल्ली वालो से दुश्मनी "

बारिश की दिल्ली वालो से दुश्मनी
जाने क्या बात है की दिल्ली के आस पास हिमाचल और उत्तरांचल जैसे खूबसूरत राज्यों के बावजूद , बारिश सब जगह होती है मगर दिल्ली प्यासी ही रह जाती है ? कभी हलकी सी बारिश होती भी है तो मिडिया ऐसा हल्ला करता है और सड़कों पे ऐसा जाम लग जाता है की , बारिश रूठ के चली जाती है . कुछ लोग कहते है की दिल्ली में सबसे ज्यादा पापी भरे पड़े है शायद इस लिए ही दिल्ली में बारिश नहीं होती , ये कारण भी सही लगता है क्योंकि , सारे बड़े नेता , राजनेता और भ्रष्ट नेता यही तो रहते हैं . जितना बड़ा नेता उसके दामन पे उतना बड़ा दाग . क्या करे प्रजा तंत्र होता ही ऐसा है. फिर चाहे बात भोपाल गैस काण्ड में मरने और यातना भोगने वाले लाखों लोगों की हो या बोफोर्स काण्ड हो या कोई और राजनैतिक घोटाला , सजा तो दिल्ली को ही भुगतनी पड़ती है. मंत्री जी कहते है की दिल्ली वाले महंगाई झेल सकने में सक्षम है , कोई उनसे कहे की कभी एक बार जरा दिल्ली की सड़कों में कूड़ा बीनने वालो या सिग्नल पे भीख मांगने वाले बच्चों से मिल कर आये , तो पता चलेगा की कितने दिल्ली वाले महंगाई की मार झेलने की तैयार है ?
ऐसा लगता है सरकार और सरकारी तंत्र लूटने में लगा है , क्या देश प्रेम? क्या फ़र्ज़ और क्या जिम्मेदारी , ना उन्हें कोई परवाह है ना कोई सरोकार और ना ही सरकार गिरने का कोई डर . ना इस बात की चिंता की पडोसी देशों से क्या नुक्सान हो सकता है , और ना ही ये की आने वाले समय में हमारे सामने कौन कौन सी समस्याए आएँगी ? उल्टा सब लूटने में लगे है और शकीरा और फुटबाल में व्यस्त है. शायद इसलिए दिल्ली प्यासी है , खुशहाली के बादल आते है और बिन बरसे चले जाते है , आम जनता को भी प्यासा ही छोड़ जाते है , क्योंकि कही ना कही वो भी पापी है , जो उन पापियों को चुनती है राज करने के लिए.

Wednesday, May 26, 2010

"आई . टी .प्रोफेशनल की व्यथा "

"किससे कहें हम व्यथा हमारी
स्वचालित डिब्बे के सामने बैठ
सींचते अपने सपनो की फुलवारी
चंद बंद ठंडी दीवारों में
सर्वेरों से उलझते , चलती जीवन की गाड़ी
किससे कहें हम व्यथा हमारी
इक समय था जब मन मदमस्त पंछी था
नीला अम्बर , सौम्य सवेरा था
अब तो रचना क्या कल्पना भी होती
बाजार की मारी
और अति अल्प समय में होती
अनगिनत युद्धों की तैयारी
किससे कहें हम व्यथा हमारी
इक पल को भी क्षणिक ना माना जाता यहाँ पे
रहना हो इस दौड़ में तो गति बढ़ाना जहाँ में
चंद उँगलियों की खट पट में छिपी होती
सुनहरे या सुलगते भविष्य की कथा सारी
किससे कहे हम व्यथा हमारी
अनगिनत गणितीय गणनाओं में
सोच से भी तेज भागती , तकनीक हमारी
याद नहीं दिन रैन यहाँ पे
बस स्वचालित सी होती सोच हमारी
क्या दीपावली क्या होली सब, समझदार बक्सों के साथ
क्या रिश्ते , क्या प्रेम इस जगत में
हर दृश्य , बस इक मूषक की चटक के बाद
क्या प्रेम क्या रास क्या रंग क्या संगवारी
सोशल नेट्वोर्किंग के नाम पे विरक्त होती , ये दुनिया सारी
बालक होते जाते समझदार ,समय से पूर्व
स्नेह , प्रेम , छल , वर्तमान का हो गया अभूतपूर्व
ना दिखता बचपन , ना मिलती सरलता की छाप हमारी
किससे कहें हम व्यथा हमारी "

मेरा पहला लेख नवभारत पर

pyaare dosto mera pahla samajit lekh navbharat times par 23 May ko publish hua.

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5965413.cms?curpg=1

Tuesday, May 18, 2010

"सवाल"

कुछ समय पहले पढ़ा की माओवादियों ने दंतेवाडा में एक बस को उड़ा दिया लगभग ४० लोग हताहत हुए . अभी दंतेवाडा में C.R.P.F. के जवानों की बलिदान की घटना को पूरा एक महिना भी नहीं हुआ और अब ये दूसरी घटना. इसके अलावा हमारे एक जाने माने मंत्री जी कह रहे हैं की अभी भी हवाई हमलों की बात करना बेकार है नक्सलियों के खिलाफ और केंद्र सरकार राज्य सरकार पे आरोप प्र्त्यारोपे कर रही है . अब सवाल ये उठता है की :
. क्या हम नक्सलियों की किसी सियासी फायदे नुक्सान के लिए खुद ही बढ़ावा दे रहे हैं ? या केंद्र सरकार की विरोधी सरकार वाले राज्यों में नयी मुसीबतें पैदा करके उसे नकारा साबित करना चाहते हैं ? या किसी फुंसी का इलाज करने वाले डाक्टर का नाम नहीं होता इसलिए , उसे नासूर बना देना चाहते है ? और तब उसका इलाज किया जायेगा ?
पहले ही हमारे देश में २८ राज्यों में कम से कम २६ में कोई ना कोई समस्यां हैं , जो की क्षेत्रवादी हैं , इसके अलावा राष्ट्रव्यापी समस्याओं की कमी नहीं है . फिर हमारे एक शांत और छोटे से प्रदेश छत्तीसगढ़ में , जो अपनी शांत और साफ़ सुथरी छवि के लिए जाना जाता था , जहाँ की स्थानीय जनता चावल और हरी मिर्च की चटनी में खुश रहती थी , आज इतनी असंतोष और आक्रोश से कैसे ग्रसित हो गयी ? उनके पास आधुनिक हथियार और युद्ध कौशल में निपुण लोग कहाँ से आ गए जो अपने जबरदस्त युद्ध कौशल के दम पे C.R.P.F. और स्थानीय पुलिस पे भी भरी पड़ रहे हैं ? जिनके पास दो वक़्त का चावल नहीं था वो बारूदी सुरंगे कैसे बिछा रहे हैं और क्यूँ ?
और हमारी सरकार और सुरक्षा तंत्र उनके आगे बेबस कैसे हुआ जा रहा है ? और अगर हम इतने बेबस है जो नकसलियों के सामने घुटने टेक रहे हैं तो , फिर हम पाकिस्तान और चीन जैसे देशों की आपतिजनक हरकतों का कैसे सामना करेंगे ?
जब भी २६ जनवरी की परेड होती है , हम पूरी उत्सुकता से और गौरव के साथ उसे देखते रहे हैं , अपने बच्चों की बताते रहे हैं की ये हमारा देश है , जबरदस्त सामरिक शक्ति से संपन्न , दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र . हम सारी दुनिया में अपने शांत और प्रगतिशील मानसिकता के कारण प्रसिध्द हैं . हमने दुनिया को पालतू चिड़ियों से परिचित करवाया , गणित और दशमलव का अविष्कार हमने किया , हमने दुनिया को रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथ दिए . हमारे देश का बनाया सूत 'दूध की वाष्प' ( vapour of milk ) कहा जाता था . चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक जैसे राजाओं का और संतो का राज हमारे देश में रहा , जिसे utopiya (आदर्श राज्य ) कहा जाता है .इसके अलावा सदियों से हमने बाहरी मेहमानों का स्वागत किया , सारी दुनिया हमें लूटती रही हमें चोट और घाव देती रही मगर हम फिर भी उन्नति के पथ पे लगातार बढ़ते रहे किसी अविरल बहने वाले झरने की तरह .
सदा ही बाहर के लोगों ने हमें लूटा मगर हम सबका सम्मान करते रहे , लेकिन क्या सदा हम लोगो से खुद को लुटवाते ही रहेंगे ?
सदा हम सबकी बात सुनने को मजबूर ही रहेंगे ? चाहे हम सही हों या गलत ? जिस राष्ट्र की नीव रखने और उसे सदा सम्मान दिलाने की खातिर हमारे नौजवान शहीद होते रहे क्या हम और शहीद करवाते रहेंगे और इन्तजार करेंगे की कोई शांति वार्ता हो और बिगड़ी मानसिकता वाले शत्रु हमसे बात करने को राजी हो जाए ?
आज भी जब दंतेवाडा की घटना याद आती है तो मन में एक सवाल आता है की क्या हमने उन जवानों की खातिर कोई स्मारक बनवाया ? कोई मोमबत्ती जलने की श्रंखला शुरू की ? क्या किसी मंत्री या नेता ने किसी मंच पे किसी बड़े पैमाने पे उन जवानों के सर्वस्वा बलिदान के लिए दो शब्द कहे ? क्या हमने कोई राष्ट्र व्यापी शोक रखा ? नहीं , बल्कि हम I.P.L. में व्यस्त थे , और chearleadres की मदमस्त अदाओं और स्कोर बोर्ड पे हमारा सारा धयान था . क्या देश के किसी कोने में हो रही अमानवीय घटनाओ से हमारा कोई सरोकार नहीं ? या उदर पोषण और पेट पालने में हम इतने व्यस्त हैं की हमें किसी राष्ट्रव्यापी बात से कोई सरोकार नहीं है ? बस हमें उस बात के बारे में सोचना चाहिए जो हमें फायदा या नुक्सान पहुचती हो सिर्फ व्यक्तिगत रूप से ?
मेरे बहुत सारे सवाल हैं , जो शायद हर तरीके से सही भी ना हो , और बहुत सारे समझदार लोग इन पे तरह तरह की टिपण्णी भी करेंगे , मगर मेरा मानना ये है की ये सवाल हम सभी को पूछने चाहिए और सबसे पहले अपने आप से पूछने चाहिए की जिन लोगों ने अगर भारत का संविधान न पढ़ा हो वो किसी प्राथमिक स्कूल के बच्चे की हिंदी की किताब का पहला पन्ना पढ़े और जाने की ये राष्ट्र कोई हलवा नहीं जिसे हर कोई चम्मच से खा ले और अपना हिस्सा पाने के लिए लड़ता रहे . ये मिटटी कई बलिदानियों के खून से सींचती रही है और आगे भी सिंचेगी मगर अगर कोई सरकार या कोई फैसला चाहे वो किसी भी स्तर पे होता हो और वो गलत हो तो हमें उसके बारे में अपने busy shedule से समय निकल कर सोचना चाहिए और विरोध भी करना चाहिए . वरना हमारे देश का हर हिस्सा जम्मू कश्मीर या तमिल आतंकियों से ग्रसित श्रीलंका जैसा हो जायेगा .शायद तब हम जागे , मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी .
वंदे मातरम

Monday, May 17, 2010

"तश्तरी के चावल "


"हर आहट पे नजरें हमारी दरों पे टिक जाती रही

बस वो ना आये जिनका हमें इंतज़ार था

यु तो छानी हैं ख़ाक बहुत सी राहों की मगर

बस वो राह ना मिली जिससे लिपट के मिट जाने का ख्वाब था

हर दरों दीवार पे जा के देखा,

हर तस्वीर में उनको तलाश के देखा

निगाहों से अपनी ये जमना बदलते देखा

अपने बाग़ की हरियाली सा कही आलम ना था

कुछ धीरे से कानो में रस घोल के चले जाते रहे वो

शायद इकरार-ऐ-इश्क ही कर जाते रहे वो

बहुत परोसे हैं ज़माने ने पकवान सामने हमारे

मगर मेरे घर की तश्तरी के चावल सा कहीं स्वाद ना था"

Sunday, May 16, 2010

गलत पाठ

गलत पाठ

आज एक अखबार में पढ़ा की छत्तीसगढ़ में बाकी राज्यों , विशेषकर (हरियाणा ) खाप पंचायतों की तरह उल जलूल फैसलों के कारन और समान गोत्र में विवाह करने वालों को सजा देने के कारण , आजकल सुर्ख़ियों में है , छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही दकियानूसी फैसला सामने आया. जहां साहू समाज में सामान गोत्र में विवाह करने के जुर्म में एक दंपत्ति को हाथ में गंगा जल लेकर ये कसम खाने को मजबूर किया गया की वो अब पति पत्नी नहीं है . जबकी वे दोनों करीब २५ सालों से पति पत्नी थे . इस दुःख में पत्नी ने आत्महत्या कर ली , उनके ३ बच्चे हैं और १ बच्चा नाबालिग है . उन बच्चों का भविष्य क्या होगा ये तो भगवान् ही जाने , मगर कुछ सवाल आज हमरे सामने खड़े हो जाते हैं ऐसे बेहूदे फैसलों और बेतुकी हरकतों से .
१. अगर उस दंपत्ति का विवाह गैर सामाजिक था तो २५ सालों तक क्या साहू समाज सो रहा था ?
२. अगर खाप पंचायतों की इतनी चलती है तो वो सभी विवाहों में अपना दखल क्यों नहीं देते ?
३. क्या वो समाज उन बच्चों के बारे में भी कुछ सोच रहा है जो अब बगैर माँ के रह रहे हैं ?
४. क्या उस व्यक्ति की खोज खबर वो समाज ले रहा जो व्यक्ति इस फैसले से सबसे ज्यादा आहत हुआ है ?
५.और क्या उनका अगला निशाना उन सभी सामान गोत्र वाले जोड़ो पे है जो विवाह कर चुके हैं ? या ये फैसला किसी व्यक्तिगत शत्रुता से प्रेरित था
६. और सबसे बड़ा सवाल की क्या पुलिस प्रशासन सो रहा था जब ये सब कुछ प्रदेश की राजधानी में हो रहा था ?
ऐसे फैसले हमारी मानसिक विकलांगता को प्रदर्शित करते हैं , और साथ ही ये बतलाते ही की हमने कभी हरियाणा या किसी अन्य प्रदेश की उन्नति और विकास की बात नहीं सीखी , अगर कुछ सीखा तो खाप पंचायतों के गैर समझदार और गंवार पने को प्रदर्शित करने वाली मानसिकता की नक़ल सीखी . हमने सही पाठ तो सीखा या नहीं ये तो मालूम नहीं मगर गलत पाठ जरूर सीखा है .
हमने दूसरे राज्यों से नक्सलवाद सीखा , अपराध सीखा , भ्रस्टाचार सीखा है , और रही सही कसर हमने खाप पंचायतों से सीख ली .
क्या हमने कभी गुजरात की आर्थिक और व्यवसायिक उन्नति की नकल सीखी ? या कभी महाराष्ट्र और हरियाणा की उन्नति की नक़ल सीखी ?
नहीं मगर हमने गलत पाठ जरूर सीख लिए .
मै सिर्फ इतना कहना चाहूँगा सभी लोगों से की क्या हम अपने प्रदेश को उन्नति की तरफ ले जा रहे हैं या बर्बादी करने और खुद को बदनाम करने के लिए हमने छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण करवाया है ? क्या हम ये सुनना पसंद करेंगे की छत्तीसगढ़ में छत्तीस समस्याएँ अपने फिर फैला रही है ?

Sunday, May 2, 2010

जवाब

पदार्थवादी सोच और जरूरत से ज्यादा व्यावसायिक दृष्टिकोण का नजरिया है की , हमारे देश में गद्ददार और लालची लोगों की भीड़ बढती जा रही है , फिर वो चाहे किसी भी क्षेत्र की बात क्यों न हो . आजकल माधुरी गुप्ता के कपड़ों और lipstick के रंग की बहुत चर्चा चल रही है . अपने देश की गुप्त दस्तावेजों की नीलामी करने वाले इंसान को किसी फ़िल्मी superstar की तरह बताया जा रहा है . और हम खुल के इसलिए नहीं बोल पा रहे हैं की , अब तक जुर्म साबित नहीं हुआ है . ये benifit of doubt का महामंत्र अक्सर गद्दार और मुजरिम (बड़े तबके के ) उठाते रहे हैं , फिर वो चाहे अजमल कसाब हो या निठारी का पंधेर या आरुशी हत्याकांड के अपराधी या फिर ताज़ा तरीन माधुरी गुप्ता . हमारी न्यायप्रणाली ज्यादातर मामलों में केवल सबूत जुटाने और कहीं किसी निर्दोष को सजा न मिल जाये इस खोज बीन में ही बहुत लम्बा समय ले लेती है. इस लम्बे समय अंतराल को ही ज्यादातर high class अपराधी ढाल बना कर इस्तेमाल करते हैं और कानून व्यवस्था को चिढाते नज़र आते हैं.
मगर मेरा सवाल ये है की , आखिर अजमल कसाब और माधुरी गुप्ता जैसे जघन्य अपराधों में , जहाँ दूसरे देशों में देशद्रोह की कड़ी से कड़ी सजा मिलती है , हमारे देश में आखिर कितने और कब तक सबूत पेश किये जायेंगे ? क्या हम अपने सुस्त रवैये और ढीली कार्यप्रणाली का नाम लेकर इस जैसे अपराधियों को बढ़ावा दे रहे हैं ? तकरीबन १००० के आस पास गवाहों और कई ठोस सबूतों के बावजूद , अभी तक कसाब जिंदा है ? निठारी वाला पंधेर आजाद घूम रहा है , ऐसे उदाहरण क्या और नए आतंकवादी हमलो और अमानवीय हरकतों को निमत्रण नहीं देते ? एक तरफ एक ऐसी भीड़ है जो मरने मारने और हमारे देश का हर तरह से नुक्सान करने को तैयार बैठी है . और एक तरफ हम है जो सिर्फ शोरे मचाने और जरूरत से ज्यादा ढील देने पे आमदा हैं . और यही नहीं हम खुद कार , मोबाइल , धन, दौलत और अपने ऐशो आराम और अय्याशियों के लिए नैतिक रूप से इतने गिरते जा रहे हैं जो की हम ना अपने राष्ट्र की चिंता कर रहे हैं , और ना ही अपनी अस्मिता की . क्या आज हमारे साथ ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ गयी है जो भारत को फिर गुलाम बना देना चाहते हैं ?
क्या दंतेवाडा , जैसी घटनाओं में हवाई हमलों जैसे ठोस क़दमों की पहल करना इतना मुश्किल है ? क्या हम इतने नाकाम हैं की कोई भी हमें डरा धमका सकता है ? चाहे वो कोई बड़े ताकतवर देश हो , या आतंकवादी , या फिर नक्सली ? ये सब बातें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और एक सामरिक शक्ति संपन्न देश को शोभा नहीं देती .
आज वक़्त है ईंट का जवाब पत्थर से देने का , जो थपड मारे उसका हाथ तोड़ देने का , कुछ ऐसा करने का की कोई इस देश के लोगों को नाकाम और डरपोक ना समझे .दुनिया जान जाये की जब बात हमारी अस्मिता की आएगी तो हम ये साबित कर देंगे उन दंतेवाडा के CRPF के वीर रणबांकुरों और कारगिल में शहीद हुए हमारे जवानों की तरह बलिदान करने और अपने शत्रु के दांत khatte कर देने में सक्षम हैं . फिर चाहे शत्रु घर के अन्दर का हो या बाहर का.
"यूँ ही गिरता नहीं लहू अक्सर , इस मिटटी के दीवानों का
सैलाब सा उठ जाया करता है रगों में अपनी ,दुश्मनों से इन्कलाब का "

Sunday, April 11, 2010

"सूरत-ऐ-हाल "



"वो सूरत-ऐ-हाल कहता है मुझसे
क्या जिंदा हैं वो हो के जुदा हमसे
कुछ समन्दर है , कुछ दरिया भी
कुछ आस्मां सा है ख्यालों में अपने
रंग तो बहुत बिखरे हैं ज़माने में
हर रंग मगर जुदा है , तुम्हारे रुखसारों से
यूँ तो कहते हो की चले जाओ गम ना करेंगे
इक दिन भी गर जो ना मिले
लिहाफ तकियों के भीगते हैं, अश्कों से
|| वो सूरत-ऐ-हाल कहता है मुझसे
क्या जिंदा हैं वो हो के जुदा हमसे
इक नजर भर के देखा था उनको कभी
समंदर के इक छोर पे
वो सैलाब नहीं था बड़ा दिल के समंदर से
इक बुझती सी ताम्बई धूप में , वो दामन समेटती तुम
इक वो शाम थी , की , नींदे ही रूठ गयी ,अपनी पलकों से
ना घबराना , ना शर्मना, ना रूठना , ना मनाना
अजीब है किस्सा मोहब्बत का अपनी
बस ठंडी रेत पर, उडती जुल्फों के साए में तेरा चलना
और पाना तुझको मेरा क़दमों के निशानों से
वो सूरत-ऐ-हाल कहता है मुझसे
क्या जिंदा है वो हो के जुदा हमसे
कुछ सीने से समन्दर के दूर , बादल बरसता है
हो के करीब भी मिलने को तरसता है
आज तरसता है ये समन्दर नीला
वो बादल लग जाए सीने से
वो सूरत-ऐ-हाल कहता है मुझसे
क्या जिंदा है वो हो के जुदा हमसे"

Saturday, March 6, 2010

"कल्पना "


"इक भीगी सी कमसिन कोरी कल्पना है मेरी
सर्द गर्म सुर्ख गालों पे है ठहरी
तेज़ हवाओं में सिमट जाती जब, नारियल के पेड़ों की पत्तियां
और पीछे से उनके , जब नज़र आती, चन्द्र-ज्योत्स्ना
कुछ ऐसी ही लगती वो, आंचल को समेटे , स्वयं रूप-प्रहरी
इक भीगी सी कमसिन कोरी कल्पना है मेरी ...
वो स्याह रात्रि सी कनखियों में, विस्मय भरे
बिरला ही हो कोई, जो उस पे ना रीझे
जाने कैसी रचना वो , अद्भुत अचरज से भरी
इक भीगी सी कोरी कल्पना है मेरी .....
वो अबोध , रूप से स्वयं के शायद ,
कभी , आतुर बड़ी , किताबों में कुछ सूखे पुष्प ढूंढती
कभी , खो चुकी सुख चैन की कल्पनाओं में खुद को
हो राधा जैसे कुञ्ज-बिहारी के आलिंगन में लिपटी
इक भीगी सी कमसिन कोरी कल्पना है मेरी
ना दुःख , ना क्षोभ का कोई चिन्ह
बस मदमाती , खनकती , चंचलता से भरी
सरलता , मानो , मुस्कान हो , शिशु जैसी
ना मोह कल का , ना चिंता कल की
इक वर्तमान का जीवन क्षणिक , मधु सा
ऐसे सरल , मदमस्त रुपहले जीवन की कल्पना है मेरी
इक भीगी सी कमसिन कोरी कल्पना है मेरी "

"गलत "


"सोचा था की धमाकों की भीड़ होगी क़दमों में हमारे
सैकड़ों सैलाबों की ताक़त होगी इरादों में हमारे
चल के आज मीलों दूर लगता है
आखिर क्या पाया , हमने अपना दिल जला के
जाने कहाँ, कब, क्या गलत हुआ मालूम नहीं
मंजिल खो गयी मगर, मंजिल की राहों में आ के "

"हादसों का सफ़र "


"ये ज़िंदगी इक सफ़र है हादसों का
कई संगीन, मगर कुछ हसीं भी हैं
ये आरामतलबी का शौक
जायज नहीं , मालूम है मुझको
दुनिया जीतने की मगर
नहीं कोई वजह भी है
मै वक़्त काटता नहीं यूँ ही
सोकर अपने हरम में
इक ख्वाब बुनता हूँ
होकर सबसे जुदा भी
तलाशता हूँ मै रोज़ खुद को
वो बाकि कहीं मेरी खुशनसीबी भी है
लगता है कभी की भूल गया राह अपनी
तपिश भरी गर्म राहों पे मेरी
शायद उनकी जुल्फों की छांव जमी भी है
तमन्ना तो की थी बड़ी उनकी
के शायद वो लबों की सुर्खी
से ज़िंदगी में हमारी रंग भरेंगे
बेरंग तो नहीं अब मगर
सुर्ख लहू से अब तो हवा रंगीन भी है
ये ज़िंदगी इक सफ़र है हादसों का
कई संगीन , मगर कुछ हसीं भी हैं "


Saturday, January 23, 2010

"परछाई"


"मुझको उनकी हर बात याद आती है

जो गिरे और उठे कभी राहों में साथ

दबी-दबी सी इक आवाज़ सुनाई आती है

मै तो चलता ही रहा अपनी धुन में अक्सर

ज़िंदगी बस कभी उखड्ती कभी दबती राह

नज़र आती है

खो चुका मै खुद को ना जाने कब

दिल की पनाह में कहीं मगर छुपा है ख्याल-ऐ-रब

दिल करता है फिर से चलूँ उस गली में

कोई अपना नहीं जहां , मगर

हर दीवार पे अपनी परछाई नज़र आती है "

Tuesday, January 12, 2010

"Soorat"

"Soorat"

1."kuchh soorat hi teri aisi hai ki, teri barat janaza apna lagti hai
kuchh adat hi apni aisi hai ki ,janaza bhi apna tujhko barat nazar ata hai
wo khayalon me rahne walo ki talab hi kharab hai
ke chamakta chehra hi tera, band gali me aftaab nazar ata hai"

2.
"badi katil soorton ke deewane hue
aaj kal hum bhi ghar se apne begane hue
wo jagah paak unche dil ki meri
naa samajh aayi kabhi katil sooraton ko
ik andheri see raat me fir hum parwane hue"

1.
"ye raat kuchh yaad dilati hai aksar
soch kar guzre waqt ko rulati hai aksar
wo chaand to to saare aasmaan me baitha hai baahen failaaye
kya ik katra us chandni ka kabhi, girta hai mere bhi ghar par"


2.
"kho chuka mai khud ko , khud ki talaash me
ek kitaab hai ye zindegani
har naye panne se juda hai, pichhli kahani
sabse meethee yaad mere maidaani shahr ki
naa koi waadi , naa koi samandar
bas mohbbaton ki hai ye hawa diwani
har shakhs hai yahan apna
dost bhi apna, dushman bhi apna
aab bhi apna, hawa bhi apni,
wo chalta, girta mera apna bachpan
wo bhagti ,khelati meri rawani
wo samjhna mera chaand ko,
wo narm ujli tapish aaftaab ki
wo pakki see chamakti sadak
aur jazbaaton ki ek lambi kahani
wo har pahla waqya zindegi ka
har fiza jaise hai saathi mere har ahsaas ki
karta hai aksar dil bahut, us mitti se lipat jaane ko
rok dene ko waqt ko aur simat jaane ko
laaun kaha se wo alfaaz jo bayaan kar sake meri mohbbat
ik baar khuda tu bhi sun le, dil ki dua
lipta de us mitti ke agosh me mujhko
fir chahe to , chheen le apni ye zindegi bemaani"